अमेरिका सहित दुनिया के लगभग सभी विकसित देश भारत को तीसरी दुनिया के देश के तौर पर देखते हैं। यही कारण है कि, वे देश भारत को ऐसे सामानों का निर्यात करते हैं जो या तो उनके लिए बेकार हो गयी होती हैं या अनुपयोगी मान ली गयी होती हैं। यह एक सीधा सा तथ्य है कि, आज के समय में कोई भी देश किसी भी देश को अपनी आधुनिक तकनीकि नहीं देता। लेकिन अमेरिका जैसे ऐसे देश भी हैं जो भारत जैसे देशों को हमेशा से ही दृष्टि से देखते रहे हैं और अपना कूड़ा कचरा इस राष्ट्र को सप्लाई करते रहे हैं।

60 के दशक में लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में इस विवाद ने काफी तूल पकड़ लिया था कि, अमेरिका भारत को घटिया दर्जे का वह गेंहू निर्यात कर रहा था जो उस देश में जानवरों को खिलाया जाता था। इसी तरह हाल ही में ऐसी जानकारियाँ सामने आयी हैं कि, भारत में अमेरिकी तेल कंपनियां गंदा ईंधन भारत को निर्यात कर रही हैं। अमेरिकी रिफाइनरियां जिस डर्टी फ्यूल वेस्ट प्रॉडक्ट को देश में नहीं बेच पा रहीं, उसे भारत भेज दे रही हैं।

गौर करने वाली बात है कि यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब भारत के कई शहर पहले से ही प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। पेट्रोलियम कोक काफी सस्ता होता है और कोयले से ज्यादा तेज जलता है। लेकिन धरती को गर्म करने वाला कार्बन भी इसमें काफी ज्यादा होता है। इतना ही नहीं, फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले सल्फर की मात्रा भी काफी ज्यादा पाई जाती है। यह पेट्रोलियम कोक कनाडा के टार सैंड्स क्रूड और दूसरे हैवी ऑइल्स को रिफाइन करने के बाद बैरल में नीचे रह जाता है।

भारत को कूड़ेदान समझता है अमेरिका
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बताया जाता है कि, देश में इसकी खपत नहीं हो रही है तो अमेरिकी कंपनियां उन देशों का रुख कर रही हैं जहां ऊर्जा की भारी मांग है। भारत उनके लिए बड़े आयातक के तौर पर उभरा है। AP की जांच में पता चला है कि पिछले साल दुनियाभर में भेजे गए अमेरिकी पेटकोक का एक चौथाई हिस्सा भारत को ही बेचा गया। 2016 में अमेरिका ने भारत को 80 लाख मीट्रिक टन से भी ज्यादा पेटकोक भारत भेजा। यह मात्रा 2010 की तुलना में 20 गुना ज्यादा है। यह मात्रा इतनी ज्यादा है कि न्यूयॉर्क शहर में स्थित एंपायर स्टेट बिल्डिंग को 8 बार भरा जा सकता है।

भारत में पहुंचा पेटकोक यहां की कई फैक्ट्रियों और संयंत्रों में जलाया जा रहा है और इससे हवा जहरीली हो रही है। दिल्ली में किये गये लैबोरेटरी टेस्ट में पता चला कि आयातित पेटकोक में कोयले के लिए तय सीमा से 17 गुना ज्यादा सल्फर मौजूद है। इसमें डीजल से 1380 गुना ज्यादा सल्फर है। भारत की पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण अथॉरिटी EPCA की ओर से यह जानकारी दी गई है। इसी तरह भारत में भी अपना पेटकोक है, जो हवा को प्रदूषित कर रहा है।

इंडस्ट्री के लोगों का कहना है कि पेटकोक दशकों से एक महत्वपूर्ण ईंधन माना जाता रहा है। हालांकि स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण की बात करने वाले जानकारों का कहना है कि अमेरिका वास्तव में पर्यावरण समस्या निर्यात कर रहा है। अमेरिका पेटकोक का दुनिया में सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है।

 

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