भारतीयों को वर्तमान एजुकेशन सिस्टम और स्कूल कालेज किस तरह तबाह कर रहे हैं इसे हम एक कहानी के जरिये समझा रहे हैं :

रामलखन और अल्बर्ट तिवारी बचपन के मित्र हैं, रामलखन ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं है, एकदम देसी टाइप का आदमी है, ना कोई झिझक ना किसी काम से शर्माने वाला, पढाई लिखाई में उसने ना घर का पैसा बर्बाद किया और ना ही अपना समय, 16 वर्ष की उम्र में ही वह शहर चला गया कमाने, उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे बस डेढ़-दो हजार रूपये, फिर भी उसने शहर जाकर कहीं कोई नौकरी नहीं ढूंढी, उसने सब्जी का बिजनेस शुरू कर दिया, धीरे-धीरे उसने सब्जी से काफी पैसे बनाये, कुछ साल बाद उसने सब्जी से कमाए गये पैसों से किराने की दुकान खोल ली और सब्जी की दुकान छोटे भाई को टेकओवर कर दी, अपनी किराने की दुकान पर उसने अपने कई करीबी लोगों को सेट कर दिया, मतलब कई लोगों को रोजगार दिया, कुछ महीनों बाद उसने शहर में घर भी ले लिया और गाड़ी भी, अब रामलखन का धंधा चोखा चल रहा है और वह और क्षेत्रों में भी इन्वेस्ट कर रहा है. आये दिन वह नए-नए बिजनेस के साथ प्रयोग भी करता रहता है. जिसमें काफी सफल भी हैं.

स्कूल कालेज तबाह कर रहे भारतीयों की पीढियां

अब आते हैं अल्बर्ट तिवारी पर, तिवारी जी काफी पढ़े-लिखे, 8 से 10 लाख उन्होंने बी टेक की डिग्री लेने में खर्चा कर दिया. लेकिन फिर भी ढंग की कोई नौकरी नहीं मिली. शहर जाकर कुछ प्राइवेट कंपनियों में भी ट्राई मारा लेकिन इंग्लिश स्पीकिंग सही ना होने के चलते इंटरव्यू ही नहीं निकाल पाये. फिर कहीं से उनके दिमाग की बत्ती जली कि, टीचिंग में काफी स्कोप है इसलिए बी.एड. या बीटीसी कर लेते हैं. शायद अपना भी चांस बन जाय, तिवारी जी ने फिर एक-डेढ़ लाख फूंककर दो साल में बी.एड. भी निपटा लिया. लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात. नौकरी वगैरह तो मिली नहीं घरवालों ने भी थक हारकर कह दिया. अब ऐसा कितने दिनों तक चलेगा. अर्थात् तिवारी जी ने घर का काफी पैसा बर्बाद किया और अपना समय भी. लाइफस्टाइल उनकी एकदम यूरोपियन शैली वाली थी, बस चमड़ी के रंग को छोड़ दें तो कोई कह नहीं सकता था कि, ये अंग्रेज हैं या भारतीय मतलब काला अंग्रेज. छोटी-मोटी प्राइवेट नौकरी करने के अलावा अब उनके पास कोई विकल्प नहीं था. इतना पढ़ लिखकर उनका माइंडसेट कुछ ऐसा बन गया था कि, छोटा-मोटा बिजनेस उन्हें अपनी तौहीन लगता था. एकतरह से पढ़ाई-लिखाई ने उन्हें निकम्मा और नकारा बना दिया था. उनकी नजर में नौकरी के बजाय खुद का छोटा-मोटा बिजनेस करने वाले लोग छोटे लोग हैं जबकि ऑफिस में टाई पहनकर जाने वाले लोग बड़े लोग हैं. इसलिए तिवारी जी ने भी एक कॉल सेंटर में 8,000 की सैलरी पर नौकरी पकड़ ली. इसके साथ ही आये दिन नेट पर फॉर्म चेक करते रहते हैं क्लर्क वगैरह का. तिवारी जी के दिमाग के किसी कोने में अभी भी सरकारी नौकरी पाने की आस बची हुयी है इसलिए आये दिन कोई ना कोई फॉर्म डालते ही रहते हैं. पढ़ाई-लिखाई ने तिवारी जी के दिमाग का ऐसा कचरा किया है, जो नौकरी से आगे की सोच ही नहीं सकते.

स्कूल कालेज तबाह कर रहे भारतीयों की पीढियां

अब आते हैं समस्या पर, समस्या या गलती तिवारी जी की नहीं है, असल समस्या वर्तमान एजुकेशन सिस्टम है, जो इसकी लपेट में आया वो खुद को बर्बाद कर रहा है, इस सिस्टम से पढ़ने पर इन्सान का दिमाग ऐसा बन जायेगा कि, वो नौकरी के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकता. वो देश में रहे या विदेश में करेगा नौकरी ही. दूसरी समस्या वो इस सिस्टम से पढ़ लिखकर इसी सिस्टम का ऐसा भयंकर मानसिक गुलाम बन जाता है. अगर आप उसे कुछ नया समझाओगे तो कुछ उसके पल्ले नहीं पड़ेगा.

स्कूल कालेज तबाह कर रहे भारतीयों की पीढियां

वर्तमान एजुकेशन सिस्टम ग्लोबल माफियाओं का दिया हुआ है जिन्होंने इसे दुनिया की पूरी की पूरी पीढी को अपना मानसिक गुलाम बनाने के लिए लादा था. ब्रिटेन ग्लोबल माफियाओं के प्यादे देशों में आता है, इसलिए जहाँ-जहाँ ब्रिटेन गया वहां-वहां उनके नियम कायदे ऐसे लागू हुए जिन्होंने पूरे के पूरे देश को मानसिक गुलाम बना लिया. यहाँ तक कि, लोगन की जबान तक बदल गयी. अंग्रेजी की सर्वोच्चता इसका प्रमाण है.

स्कूल कालेज तबाह कर रहे भारतीयों की पीढियां

ग्लोबल माफिया जॉन डी रॉकफेलर ने कहा था : I don’t want a nation of thinkers, I want a nation of workers (अर्थात् हमें मजदूरों का देश चाहिए, विचारकों का नहीं)

माफिया रॉकफेलर ने ही 1903 में अमेरिकन एजुकेशन बोर्ड की स्थापना की थी. जिसका लक्ष्य मजदूरों का देश तैयार करना था जहाँ लोग सिर्फ गुलामी और बंधुआ मजदूरी करें ना कि स्वतंत्र रूप से सोचें विचारें. क्योंकि स्वतंत्र रूप से सोचने वाले लोग गलत चीजें बर्दाश्त नही कर पाते और वो विद्रोह कर देते हैं. इसलिए एजुकेशन एक अच्छा टूल है पूरी की पूरी पीढी का दिमाग बदलने का.

स्कूल कालेज तबाह कर रहे भारतीयों की पीढियां

भारत में अबतक ब्रिटिशों का दिया एजुकेशन सिस्टम चल रहा है उसका कारण यही है कि उसमें ग्लोबल माफियाओं का भी फायदा है और भारत के नेताओं का भी. इसलिए भारत में कभी इस विषय पर सोच-विचार ही नहीं किया गया कि, आखिर वह क्या कारण है कि तथाकथित शिक्षा का स्तर बढने के बाद भी देश गर्त में जा रहा है. इस एजुकेशन सिस्टम से लोग ना ही मात्र तबाह हो रहे हैं बल्कि अपराधी भी बन रहे हैं.

किसी जमाने में जिसे बंधुआ मजदूरी कहा जाता था आजकल उसे प्राइवेट नौकरी कहा जाता है, जहाँ सिर्फ लोगों का शोषण होता है. लेकिन फिर भी लोगों को इसका भान नहीं होता कि, वो किसी के गुलाम हैं, क्योंकि गुलामी और बंधुआ मजदूरी को नए नए शब्द दे दिए गये हैं, जॉब, एम्प्लोयी और भी ना जाने क्या क्या.

स्कूल कालेज तबाह कर रहे भारतीयों की पीढियां

महान शिक्षाविद, केन रोबिन्सन कहते हैं : Education kills creativity (अर्थात शिक्षा रचनात्मकता को खत्म कर देती है)

धरती पर रहने वाला हर प्राणी अच्छे से जानता है किस तरह जीना श्रेयस्कर है, ये उसे कोई नहीं सिखाता. क्योंकि ये ज्ञान धरती पर रहने वाले हर एक प्राणी को खुद ब खुद प्राप्त होता है. मानव को छोड़कर कोई भी जानवर ये सब सीखने स्कूल नहीं जाता. स्कूल कालेज में पढ़ने वाले लोगों के दिमाग में ग्लोबल माफियाओं द्वारा दिए गये सिस्टम से निर्मित हुए मानसिक गुलाम अध्यापकों और भारतीयों को बर्बाद करने के लिए बनाई गयी किताबें इतना अधिक कचरा भर चुकी होती हैं कि, वो पूर्णतया मानसिक गुलाम हो गये होते हैं.

एजुकेशन सिर्फ लोगों को कंट्रोल करने और उन्हें मानसिक तौर पर गुलाम बनाये रखने का एक टूल भर है 

Educationalist Ken Robinson का वीडियो जरुर देखें :

(Video Source : TED Talks)

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