FINANCIAL RESOLUTION AND DEPOSIT INSURANCE BILL (वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा बिल ) 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, वर्तमान सरकार कोई भी नया कानून या बिल संसद मे लाने से पहले जनता को उसका उद्देश्य बताना जरूरी नही समझती, इन साढ़े तीन वर्षों में वर्तमान सरकार ने अपने किसी भी फैसले पर स्पष्ट उत्तर नही दिया और न ही उसका उद्देश्य स्पष्ट किया है। केवल इतना ही कह के पल्ला झाड़ लिया जाता है की जो भी किया जा रहा है आपकी भलाई के लिए ही किया जा रहा है।

बकरे को हलाल करने से पहले भी उसे यही दिलासा दिया जाता है की जहाँ भी ले जाया जा रहा है उसे उसकी भलाई के लिए ही ले जाया जा रहा है। काटने से पहले काफी सेवा सत्कार की जाती है, फिर भी मन नही भरा तो दो-चार आंसू भी टपका दिए जाते हैं ताकि भावनाओं में बहकर बकरा खुद अपनी गर्दन तलवार पर रख दे। यही काम आजकल मोदी सरकार भारतीयों के साथ कर रही है।

ये एक परंपरा सी बनती जा रही है, जब मंत्रियों के दिलासाओं से भी काम नही बनता है तो साहब रैलियों में रो दिया करते हैं, ताकि लोग भावनाओं में बहकर अपनी गर्दन कटवाने को तैयार हो जाएँ। FRDI Bill के मामले में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री केवल दिलासा दे रहे हैं कि आपका पैसा बैंकों में सुरक्षित रहेगा।

संसद के पिछले सत्र (अगस्त 2017 ) में पेश किया गया Financial Resolution and Deposit Insurance Bill अर्थात वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा योजना। इस बिल में Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation (DICGC) को हटाकर Resolution Corporation (RC) नामक संस्था को लाया गया है। जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम (DICGC) रिज़र्व बैंक की सहायक कंपनी है। इसकी स्थापना 15 जुलाई 1978 को DICGC ACTके तहत हुई थी।

DICGC सभी बैंक जमाओं की सुरक्षा करता है, जैसे कि बचत, स्थिर, वर्तमान, आवर्ती डिपाजिट आदि, एक बैंक में प्रत्येक जमा का 100,000 की सीमा तक अर्थात प्रत्येक मूल और ब्याज राशि दोनों के लिए प्रत्येक ग्राहक हेतु अधिकतम 1,00,000 रुपये का बीमा किया गया है। अगर ग्राहक के पास अलग-अलग बैंकों में खाते हैं, तो उन सभी खातों को अधिकतम , रुपये तक बीमा किया जाएगा। हालांकि, यदि एक ही बैंक में अधिक खाते हैं, तो उन सभी को एक ही खाते के रूप में माना जाएगा।

DICGC ACT के तहत बीमा प्रीमियम बीमाकृत बैंकों द्वारा ही भुगतान किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि जमा बीमा सुरक्षा का लाभ जमाकर्ताओं या बैंक के ग्राहकों को मुफ्त में उपलब्ध कराया जाता है। Resolution Corporation में ऐसा कोई प्रावधान नही है जिससे ग्राहकों की जमा राशि की सुरक्षा की गारंटी दी जा सके। इसलिए यह ग्राहकों के लिए चिंता का विषय है, बिना कोई गारंटी के बैंकों पर भरोसा होना असंभव है।

Resolution Corporation का इससे भी खतरनाक पहलू इसके द्वारा पिछले दरवाजे से पब्लिक सेक्टर बैंकों का निजीकरण करना है। आइये समझते हैं की कैसे इससे बैंकों का निजीकरण होगा :

RC के कार्य

1. Monitoring Financial Firms(वित्तीय फर्मों की निगरानी)
2. Anticipating their Risk of Failure(विफलता के अपने जोखिम की आशंका)
3. Taking Corrective Action(सुधारात्मक कार्यवाही करना)
4. Resolving them in Case of Failure(असफलता के मामले में उन्हें हल करना)
इन सब के अलावा RC को दो और शक्तियाँ दी गयी है, जिस कारण बिल विवादों में फंस गया और संसद के पूर्व सत्र में पास नही हो पाया :
1. RC को पूर्ण अधिकार
2. Bail In का अधिकार

RC के आने के पहले दिन से ही कोआपरेटिव बैंकों की शारी शक्तियाँ ख़त्म हो जाएँगी और सारे अधिकार RC को दे दी जाएँगी। यदि किसी कोआपरेटिव बैंक के ठीक से कार्य नही करने की खबर आती है तो तत्काल ही RC बैंक को टेकओवर कर लेगी। RC बैंकों की liability ख़त्म कर सकता है, बैंकों को मर्ज कर सकता है, बैंकों को बंद कर सकता है, बैंकों को liquidate कर सकता है, RC को पूर्ण अधिकार दिए गए हैं। हालाँकि बैंकों के सारे अधिकार समाप्त कर दिए गए है, बैंकों द्वारा ठीक से काम नही करने का बहाना बनाकर RC बैंकों को टेकओवर कर लेगी और अत्यधिक घाटा दिखाकर प्राइवेट फर्मो को handover कर सकती है।

मान के चलिए ऐसी खबर आएगी किसी दिन की बैंक ऑफ़ बड़ौदा या विजया बैंक ठीक से काम नही कर रही है, तो तत्काल ही RC बैंकों को टेकओवर कर लेगा और भारी घाटा दिखाकर उद्द्योगपतियों या अंतर्राष्ट्रीय बैंकरों को handover कर देगा। इस प्रकार से पिछले दरवाजे से बैंकों का प्राइवेटाइजेशन का कुचक्र रचा जा रहा है और हम भारत वासी सदियों से किसी एक व्यक्ति को सत्ता थमाकर सो जाते रहे हैं।

एक समय राष्ट्रहित के लिए एक प्रधानमंत्री ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था और अब दूसरा प्रधानमंत्री बैंकों का निजीकरण करने में जान लगा रहा है।

FRDI Bill में सबसे खतरनाक Bail In का प्रावधान है। RC को ही Bail In का भी अधिकार दिया गया है। Chapter 12 के Article 52 में Bail In का प्रावधान है। Article 52 पैरा 3(1): RC बैंकों की liability खत्म कर सकती है अर्थात बैंक अपनी Liability (उधार) चुकाने से मना कर सकते है। बैंकों के पास पड़े ग्राहक के पैसे को Liability कहते हैं, जिसे देर सबेर बैंकों को ग्राहक को वापस करना है। पर नए प्रावधान के अनुसार बैंक उसे ग्राहक को लौटाने से मना कर सकती है। (2) बैंक कोलेटरल और मार्जिन कम कर सकती है। (3) बैंक नए शेयर जारी करके मार्किट से पैसा उठा सकती है। हालांकि ये प्रावधान भी है कि बैंक बेल इन करते समय नीचे लिखे Assets के साथ छेड छाड़ नही कर सकती (सेक्शन 52, पैरा 7) 1. जमाकर्ता का पैसा (जैसे आपकी savings/RD/FD इत्यादि) 2. जमाकर्ता के असेट (जैसे आपकी लॉकर में पड़ी संपत्ति, मॉर्गेज रखे हुए चल अचल संपत्ति) । सेक्शन 53 Bail In प्रावधान की शक्तियों के विषय में है। सेक्शन 53 पैरा 1(a) में साफ़ साफ़ लिखा है की सेक्शन 52 में दी गयी सारी सिक्योरिटीज को निरस्त या संशोधित किया जा सकता है। सीधे तौर पर कहें तो सेक्शन 52 में दी गयी सुरक्षा केवल एक ढोंग थी जिसे सेक्शन 53 के तहत निरस्त की जा सकती है।

Bail In का प्रावधान आया कहाँ से 

2008 के वित्तीय मंदी के बाद अमेरिका को ये समझ में आ गई की अब वो Bail Out कर बैंकों को बचा नही सकता क्योंकि वहाँ की अधिकतर बैंक प्राइवेट सेक्टर के हैं। अब उनलोगों ने दूसरे मैकेनिज्म के विषय में सोचना आरम्भ किया। G7 देशों ने मिलकर एक नए बोर्ड का गठन किया, Financial Stability Board। बाद में उनलोगों ने G20 देशों को भी अपने साथ मिलाया और भारत भी G20 देशों में शामिल है। FSB ने Bail In के लिए एक ड्राफ्ट प्रस्तावित किया। इनलोगों ने एक नोट लाया Key Attributes of Effective Resolution। इसी key attribute से FRDI Bill में Bail In का प्रावधान हुबहु नक़ल की गयी है। इस बिल के क्या प्रभाव हो सकते हैं, एक पूर्व घटित घटना से समझते हैं।

चार वर्ष पूर्व साइप्रस ने यह बिल पास किया था। 2013 में जब Bank of Cyprus डूब रहा था तो ग्राहकों का 37.5 % liability(उधार) को equity में परिवर्तित कर दी गयी अर्थात ग्राहकों के पैसे का 37.5% हिस्सा उन्हें तत्काल चुकाने से इनकार कर दिया गया। यदि ऐसा ही भारत में हुआ तो क्या होगा ? सोचिये यदि किसी दिन किसी भी भारतीय बैंक की दिवालिया होने की खबर आई तो क्या होगा ?

SBI का उदाहरण ले लेते है, क्योंकि इसका NPA भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच चूका है। अकेले SBI का NPA पूरे 38 बैंकों के NPA का 22.7% है। जून 2017 में आये आंकड़ों के अनुसार SBI का NPA 1,88,068 करोड़ तक पहुँच चुकी है। आंकड़ों के अनुसार मार्च 17 तक SBI का total deposit 20,44,751.39 करोड़ है। अगर बैंक दिवालिया होने की स्थिति में इस deposit का 40% भी equity में बदल दे तो ग्राहकों का लगभग 6,13,425.41 करोड़ सीधे डूब जाएगा। मैंने न्यूनतम लिया है यदि RC चाहे तो पुरे पैसे को equity में बदल सकती है। फिर यदि बैंक बचा तो ग्राहकों के पैसों कि रीकवरी संभवतया 10-15 वर्षों में हो जाये अन्यथा ग्राहकों को इन पैसों से हाथ धोना पड़ेगा।

Bail In की जरूरत क्यों पड़ी 

RBI के आंकड़ों के अनुसार जून 2017 तक बैंकों का NPA बढ़कर 8,29,338 लाख करोड़ तक पहुँच चूका है। जिस कारण सारे बैंक मरणासन्न अवस्था में आ गए। विभिन्न Defaulters से पैसे वसूलने की जगह, पहले तो इन बैंकों को बचाने के लिए सरकार ने विमुद्रीकरण किया फिर 2.11 लाख करोड़ का Bail Out देकर बैंकों को Remonitize किया और जब बात तब भी नही बनी तो अब सरकार ने Bail In का प्रावधान लाया है, जिसके अंतर्गत अब ग्राहकों के पैसों से ही बैंकों का पुनरुत्थान होगा। बैंक डूबने की अवस्था में ग्राहकों को उनकी liability के ही अनुसार equity दे देगी।

Equity क्या है 

Equity एक प्रकार का शेयर है अर्थात बैंक आपको आपके liability के अनुसार शेयर दे देगी, जिसकी वैल्यू तत्काल जीरो होगी क्योकि बैंक उस समय डूब रही होगी। यदि बैंक 5 या 10 वर्ष में पुनः खरी हो पायी, तो ही ग्राहकों के पैसों की रिकवरी हो पाएगी अन्यथा बैंक के साथ ग्राहकों के पैसे भी डूब जायेंगे।

a report by Prashant Rahi (member of team agnimitra, researcher on geopolitics & economical affairs)