पिछले लंबे समय से भारत में गौहत्या और हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे लगातार चर्चा में हैं. ये दो ऐसे मुद्दे हैं जिसमें भारत पिछले सैकड़ों सालों से उलझा रहा है. यह वही समस्या है जिसने महान भारतवर्ष के टुकड़े-टुकड़े कर दिए लेकिन फिर भी यह मुद्दा शांत नहीं हुआ. सोचने वाली बात है कि, अमेरिका में होने वाले गृहयुद्ध समाप्त हो गये. ब्रिटेन में होने वाले ब्रिटिश-आयरिश लोगों के बीच होने वाले कत्लेआम शांत हो गये यहाँ तक कि, हजारों वर्षों से चला आ रहा यूरोप में यहूदी-ईसाई संघर्ष भी खत्म हो गया लेकिन भारत में आजतक हिन्दू-मुस्लिम मुद्दा खत्म नहीं हो पाया. उसका वास्तविक कारण यह है कि, आजतक भारत में कभी इस मुद्दे पर कभी स्वतंत्र रूप से विचार ही नहीं किया गया कि ऐसा क्यों होता आया है इस समस्या की जड़ें कहाँ हैं. चूँकि यह राजनीतिक पार्टियों के लिए काफी लाभ का सौदा होता है इसलिए वह भी इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए कभी उत्साहित नहीं दिखीं.

गौहत्या और हिन्दू-मुसलमान दंगो का सच
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पक्ष हो या विपक्ष दोनों ही पक्षों के लिए ये मुद्दा किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं होता जो उन्हें चुनावों में नया जीवन देता है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि, छोटी-छोटी बातों से भ्रमित हो जाने वाली देश की भोली जनता इन्हीं राजनीतिक पार्टियों में से किसी को अपना हमदर्द मान लेती हैं जबकि वास्तव में राजनीतिक पार्टियाँ किसी समुदाय की पक्षधर नहीं बल्कि सिर्फ अपने निहित स्वार्थों के लिए काम करती हैं. भले ही यह समस्या जनसाधारण के लिए जीने-मरने का कारण हो लेकिन देश के नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के लिए यह मुद्दा सिर्फ सेक्युलर-और सांप्रदायिकता पर आकर खत्म हो जाता है. हिन्दू हों या मुस्लिम दोनों ही पक्ष वर्षों से दिल को बहलाते आ रहे हैं कि, हम विजयी हुए वे हारे. जबकि वास्तव में वे किसी दुश्मन से नहीं लड़ रहे होते बल्कि किसी तीसरे दुश्मन के फंसाए जाल में फंसकर एक हिंसक और खूनी नाटक का मंचन कर रहे होते हैं. जिसके जन्मदाता एवं डायरेक्टर-निर्माता वही विदेशी दुश्मन थे जिन्होंने भारत में देश की जनता को बांटने के लिए ‘बांटो और राज करो नीति’ को जन्म दिया. गौहत्या और हिन्दू-मुस्लिम दंगों की जड़ों के बारे में जानने के लिए हमें इतिहास में चलना होगा जब ब्रिटिशों ने खुद की गर्दन बचाने के लिए भारतीयों को ही आपस में भिड़वा दिया ताकि खुद सलामत रहें.

ज्यादातर भारतीय यह जानते हैं कि, 1857 में गौमाता के कारण ही क्रान्ति हुयी थी जिसमें हिन्दू-मुसलमान सभी मिलकर ब्रिटिशों के खिलाफ लड़े थे लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि, इसी क्रान्ति के कुछ वर्षों बाद 1870 के दशक में भारत में गौहत्या निषेध के लिए एक जबरदस्त आंदोलन शुरू हुआ था लेकिन इस आंदोलन का इतिहास अंग्रेजो और उनके प्रति समर्पित भारतीय इतिहासकारों ने दबा कर रखा. 1870 से लेकर 1894 तक लगभग 24 वर्ष तक इस देश में गौ हत्या निषेध का जबरदस्त आंदोलन चला और अंग्रेजों की खुफिया विभाग की रिपोर्ट की माने तो 1857 का आंदोलन जितना बड़ा था उससे कई गुना बड़ा यह गौ हत्या निषेध का आंदोलन था. इस आंदोलन ने भारत ने ब्रिटिश राज की चूलें हिलाकर रख दीं थीं.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में प्रख्यात गांधीवादी धर्मपाल जी को आमंत्रित किया और उनसे भारत में गौहत्या के इतिहास पर शोध करने को कहा. इसके साथ ही वाजपेयी जी ने धर्मपाल से इसका निवेदन किया कि, इसके लिए आवश्यक ब्रीटिश दस्तावेजों का भी अध्ययन किया जाय जो इंडिया हाउस ब्रिटेन में उपलब्ध थे. 2002 में धर्मपाल जी और उनके सहायक टी.एम. मुकुन्दन ने वर्ष 2002 में प्रधानमंत्री वाजपेयी के समक्ष अपना शोध प्रस्तुत किया. इस शोध पर लिखी गयी पुस्तक का नाम था “The British Origin of Cow-Slaughter in India” अर्थात ‘भारत में गौहत्या का ब्रिटिश मूल’ इस शोध में धर्मपाल जी और उनके सहायक मुकुन्दन जी ने पूरे ब्रिटिश साजिश की पोल खोलकर रख दी. किस तरह ब्रिटिशों ने भारत में गौहत्या शुरू की और गायें काटने के लिए मुस्लिम धर्म से संबंध रखने वाले एक समुदाय को जबरदस्ती गायें काटने के लिए तैयार किया और यहीं से शुरुआत होती है हिन्दू-मुस्लिमों में तनाव की.

महान विद्वान एवं देश के खिलाफ रची जाने वाली कई साजिशों से पर्दा उठाने वाले महात्मा राजीव दीक्षित जी ने भी इस विषय पर प्रकाश डाला है. राजीव जी के अनुसार, आज जिस स्थान पर हरियाणा है (जो पहले पंजाब का भाग था) इस इलाके से यह आंदोलन शुरू हुआ था और अंग्रेजो के खुफिया रिपोर्ट बताती है कि सबसे पहले यह आंदोलन वर्ष 1870 में जींद से शुरू हुआ था जींद उस समय एक बड़ी रियासत हुआ करती थी. इस गौ रक्षा आंदोलन को लेकर गौरक्षा सभा बनाई गई थी उसमें कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया था कि गाय को कटने नहीं देंगे और जो अंग्रेज गाय काटेगा उस अंग्रेज को हम काटेंगे. आपको जानकर हैरानी होगी कि, गौरक्षा के लिए बनी इस क18 सदस्यीय कमेटी में 11 सदस्य हिन्दू थे जबकि 7 सदस्य मुस्लिम समुदाय से थे.

इस तरह जींद से शुरू हुआ आंदोलन धीरे धीरे संपूर्ण भारत में फैल गया 1890 तक आते-आते 1 करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ता इस गौरक्षा आंदोलन में शामिल हो गए. इन कार्यकर्ताओं ने अंग्रेजों द्वारा चलाये जा रहे जगह-जगह कत्लखाने बंद करवाने शुरू कर दिए. यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि, पहले भारत में गायें काटने और उनके मांस को ब्रिटिशों के लिए तैयार करने की काम ब्रिटेन से लाये गये लोग ही करते थे. इस आंदोलन के चलते परिणाम यह हुआ कि, जगह-जगह अंग्रेजों को कत्ल करने के लिए जानवर मिलना बंद हो गए. गाय के मांस को बीफ बोलने वाले अंग्रेज जो कि बिना गौंमांस के एक दिन भी नहीं रह सकते थे उनके लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गयी. बीफ आज भी अंग्रेजों के भोजन का बेहद आवश्यक अंग है. अगर आप कभी ब्रिटेन या यूरोप के किसी देश जायेंगे तो शापिंग माल्स में देखेंगे कि, वहां गौमांस पैकेटों में ठीक वैसे ही बेचा जाता है जैसे हमारे यहाँ सब्जियां.

यही कारण था कि, बिना गाय का मांस खाए ब्रिटिश एक दिन भी रह नहीं सकते थे जिसके चलते अंग्रेजी सेना में विद्रोह की स्थिति आ गई. ज्ञात हो कि, 1857 के विद्रोह के डर से भारत में ब्रिटिशों ने अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी थी जिस कारण गौमांस की खपत भी ज्यादा हो गयी थी और कत्लखानों की संख्या भी बढ़ गयी थी. लेकिन आंदोलन के कारण अब अंग्रेजी सरकार के लिए एक तरफ कुआँ और एक तरफ खाई की स्थिति थी. गौ रक्षा करने करने वाले कार्यकर्ता गाय मिलने नहीं दे रहे थे और अंग्रेजी सैनिक गाय का मांस ना मिले तो बगावत करने को तैयार थे. यह सब देखते हुए तत्कालीन ब्रिटिश शासकों ने एक युक्ति निकाली जिसके चलते ना ही मात्र गौरक्षा आंदोलन कमजोर होता गया बल्कि गायें कटना फिर उसी तरह जारी हो गया जैसे पहले होता था. एक बार फिर ब्रिटिशों ने इस मुद्दे पर अपनी वही पुरानी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई.

गौहत्या और हिन्दू-मुसलमान दंगो का सच
लार्ड लैंसडाउन Source

उस समय भारत का ब्रिटिश गवर्नर लार्ड लैंसडाउन हुआ करता था. लैंसडाउन ब्रिटिश राजपरिवार के एक महत्त्वपूर्ण अंग रहे ‘मार्कस ऑफ़ लैंसडाउन’ परिवार से था. लार्ड लैंसडाउन का दादा ब्रिटेन का प्रधानमंत्री भी हुआ करता था. यही कारण था कि, लैंसडाउन उन मुख्य ब्रिटिश साजिशकर्ताओं में आता था जो भारत में ब्रिटिश राज कायम रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. रानी विक्टोरिया और लैंसडाउन ने पत्र व्यवहार के माध्यम से इस समस्या का हल निकालने के लिए गहरी साजिशें रचीं. लैंसडाउन ने एक मीटिंग बुलाई. मीटिंग बुलाकर उसने आदेश दिया कि जितने सरकारी कत्लखाने हैं उनमें मुसलमानों की भर्ती की जाए. चूँकि गौरक्षा आंदोलन में हिन्दुओं के साथ मुस्लिम भी लगे थे इसलिए सैकड़ों वर्षों से इस काम से परहेज करने वाले मुस्लिम समाज में से कोई भी इस भर्ती के लिए तैयार ही नहीं हुआ.

कोई भी रास्ता ना देख ब्रिटिशों ने कुरैशी जाति समूह के मुसलमानों को प्रताड़ित कर गाय के कत्ल के काम में लगा दिया. जो इस काम के लिए तैयार नहीं होता था अंग्रेज उन्हें भयानक सजायें देते थे. कम ही लोग जानते होंगे कि, पहले बकरों का मांस काटने वाले लोगों को ‘बकर-कसाब’ कहा जाता था लेकिन कत्लखानों में उनकी भर्ती होने के बाद एवं गाय का मांस काटने के चलते उन्हें ‘कसाई’ कहा जाने लगा. कसाई आज भले ही मांस काटने संबंधी एक प्रोफेशन का साधारण सा नाम बन गया हो लेकिन पहले यह बेहद ही घृणित शब्द हुआ करता था जिसका प्रयोग निर्दयी लोगों के लिए किया जाता था. आज भी कई बार निर्दयी लोगों के लिए कसाई का शब्द का प्रयोग किया जाता है. इसी तरह अंग्रेजों ने बकर-कसाबों को ‘कसाई’ बना डाला. गाय काटते थे कुरेशी समाज के लोग अंग्रेजों के दबाव में आकर फिर अंग्रेज इसको पूरे देश में प्रचारित करते थे हिन्दुओ  के बीच में देखो तुअंग्रेज जबरनगाय कटवाते कुरैशियों से लेकिन हिन्दुओं के बीच यह फैलाते कि, ये गायें मुसलमान काट रहे हैं.

गौरक्षा के लिए मिलकर आंदोलन कर रहे हिन्दू मुस्लिमों के बीच अंग्रेजों ने इस बात का जोर-शोर से प्रचार प्रसार करना शुरू कर दिया कि, भारतीय कत्लखानों में गायें काटने का काम मुस्लिम कर रहे हैं. लेकिन फिर भी हिन्दू-मुस्लिमों की एकता इस साजिश के चलते नहीं टूटने वाली थी. कुछ वर्षों तक लोग इसे अंग्रेजों की साजिश मानकर चलते रहे लेकिन अंग्रेज इससे कहाँ रुकने वाले थे उन्होंने दोनों तरफ से कुछ लोगों को डरा धमकाकर एवं लालच देकर तनाव फ़ैलाने के काम में लगा लिया. लैंसडाउन ही वह खलनायक था जिसने रानी विक्टोरिया और ब्रिटिश नीतिकारों के साथ मिलकर हिन्दू-मुस्लिमों के बीच तनाव बढाने के लिए साजिशें रचीं थीं.

धर्मपाल जी और टी एम मुकुन्दन ने अपने शोध में उस पत्र को भी शामिल किया है जो इस घटनाक्रम से संबंधित था और लैंसडाउन को विक्टोरिया द्वारा 8 दिसंबर 1893 को भेजा गया था. पत्र का एक अंश :

December 8, 1893 to her Viceroy, Lord Lansdowne,

“Though the Muhammadans’ cow-killing is made the pretext for the agitation, it is in fact directed against us, who kill far more cows for our army, etc. than the Muhammadans.”

जिसका अर्थ है ‘यद्यपि मुहम्मडनों के लिए यह बहाना बना दिया गया है, हालंकि वह हमारे खिलाफ था जो गायों को ज्यादा से ज्यादा हमारी सेना के लिए मारते हैं ना कि मुहम्मडनों के लिए (मुसलमानों के लिए उस समय ब्रिटिश मुहम्मडन शब्द का प्रयोग करते थे जो संभवतः मुहम्मदीन Muhammadeen शब्द का ही बिगड़ा रूप था अर्थात् वे लोग जो मुहम्मद के दीन-शिक्षाओं को मानते हैं)

विक्टोरिया और लैंसडाउन की इन साजिशों के बाद जो नीति बनी उस में हिंदू और मुसलमान आपस में लड़ने लगे. मुसलमानों के बीच में प्रचार किया गया कि कुरेशी को बहिष्कार करो क्योंकि यह गाय काट रहे हैं. इसी तरह हिंदुओं में प्रचार किया गया कि मुस्लिमों को मारो पीटो क्योंकि तुम्हारी गाय काट रहे हैं और अंग्रेज पूरे सुरक्षित हो गए. 1890 के दशक में ब्रिटिशों की यह नीति बनी और 1897 में इस नीति ने पूरे देश में एक विस्फोट कर दिया और पहली बार हिंदू मुसलमान का पहला दंगा 1897 में अंग्रेजों ने कराया. यह साजिश अंग्रेजों ने मात्र इसीलिये रचीं कि, हिंदू मुसलमान अलग अलग हो जाएं एवं इस देश की गाय कटती रहे और अंग्रेजों का शासन सुरक्षित रहे. लैंसडाउन वह खतरनाक अंग्रेज अधिकारी था जिसने हिंदू मुसलमानों को लड़वाया और हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ और मुसलमानों को हिन्दुओं के खिलाफ बरगलाया. ऐसे काम के लिए लैंसडाउन ने कुछ टीम बना रखी थी. उस टीम का काम था मस्जिदों के सामने सूअर काटकर फेंकना और मंदिरों के सामने गाय काटकर फेंकना.

लैंसडाउन की टीम के लोग सवेरे हल्ला मचाया करते थे कि, देखो हिंदुओं ने सूअर काट के मस्जिद में डाल दिया फिर लैंसडाउन के लोग यही काम मंदिर के पास जाकर करते थे कि, मुसलमानों ने गाय को काट दिया. इस तरीके से ब्रिटिशों ने भारत में दंगा भड़काया और 1897 में जब दंगा भड़का तो यह दंगा भड़कते-भड़कते 1905 तक इतना खतरनाक हो गया कि अंग्रेजों ने हिंदू और मुसलमानों के आधार पर देश का विभाजन करने का तय कर लिया और बंगाल राज्य को पूर्वी  बंगाल और पश्चिम बंगाल में बांट दिया. ऐसा नहीं था कि, भारतीय अंग्रेजों की साजिशें नहीं समझे बल्कि भारतीय समाज में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं थी जो अंग्रेजों की इस साजिश से भली-भांति परिचित थे और बचाव की मुद्रा में थे. यही कारण था कि. अंग्रेजों ने भारत में जितने भी खलनायक चुने उनमें से एक भी अपनी मर्जी से उनके साथ नहीं गया था बल्कि सभी को अंग्रेजों ने कोई ना कोई लालच देकर या फिर मौत का डर दिखाकर अपने काम के लिए नियुक्त किया था. जिन्ना भी अंग्रेजों का इसी तरह का प्यादा था जिसे अंग्रेजों ने मुस्लिमों का मुखौटा बनाकर देश को बांटा था जबकि जिन्ना के ही सहयोगी और उनसे ज्यादा योग्य मोहम्मद करीम छागला जैसे लोग ना ही मात्र भारत में रहे बल्कि जिन्ना का कड़ा प्रतिरोध करने के साथ ही अंग्रेजों की साजिशों का भी पर्दाफाश किया था. जो लोग मुसलमानों (जिन्ना जैसे दलालों के चलते) को देश को बांटने वाला बताते हैं वो यह कभी नहीं बताते कि, जिन्ना के साथ के ही मोहम्मद छागला जैसे लोग उसके सख्त खिलाफ थे. भारत में हिन्दू-मुस्लिमों के बीच अगर यह तनाव पनपा तो उसके जिम्मेदार अंग्रेज ही थे जिन्हों ऐसी साजिशें रचीं जिससे भारत आजतक नहीं उबर पाया.

जिस तरह अंग्रेजों ने भारत से जाते जाते सत्ता का हस्तान्तरण काले अंग्रेजों को कर दिया उसी तरह काले अंग्रेजों ने भी अंग्रेजों की हर वह ‘कु’नीति और साजिश रचने का ढंग अपना लिया जैसा कि वह भारत में किया करते थे. इन काले अंग्रेजों  और अंग्रेजों में अगर फर्क है तो सिर्फ चमड़ी का बाकी सभी आदतें वही हैं जो अंग्रेजों की थीं. आज यह देखकर बेहद दुःख होता है कि, जिस अंग्रेज अधिकारी लैंसडाउन ने भारत में हिंदू और मुसलमानों के बीच ऐसी ऐतिहासिक खाई खोदी कि देश आजतक जल रहा उसी लैंसडाउन के नाम से हमारे भारत के उत्तराखंड (पौड़ी गढ़वाल) में एक पूरा शहर बसा हुआ है. लैंसडाउन के नाम से हमारे देश में कई बाजार, रोड और बिल्डिंगें भी हैं. भारत धरती का एकमात्र ऐसा अजूबा है जो अबतक गुलामी के दिनों वाले कलंकों को अपने साथ ढो रहा है. हम हिन्दू मुस्लिम में ऐसे खो चुके हैं कि, हमारे देश में औरंगजेब रोड का नाम बदलवाने के लिए कैंपेन चल सकते हैं लेकिन लैंसडाउन जैसे शैतानों के बारे में लोग रत्ती मात्र भी ज्ञान नहीं रखते. उसका कारण यही है कि, भारत का इतिहास अंग्रेजों ने लिखवाया था जिसमें सिर्फ और सिर्फ देश को बांटने और देश के लोगों के बीच नफरत को बनाये रखने वाली चीजें ही शामिल की गईं हैं. भारत में करोड़ों लोगों का कत्लेआम करने के बावजूद भी अंग्रेज बड़ी चालाकी से साफ़ बच निकले.