बैंक वर्तमान मानव जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है जिसके बगैर आज के जमाने में किसी भी विषय वस्तु की कल्पना भी नहीं की जा सकती. एकतरह से बैंक ही वह घटक हैं जो मानव जीवन को नियंत्रित करते हैं क्योंकि उन्हें के छापे नोटों से ये दुनिया चल रही है. लेकिन बैंकों का जन्म किस प्रकार हुआ व ये अस्तित्व में कैसे आए इसके बारे में शायद ही किसी ने सोचा हो. यहां तक की बैंकों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी नही पता होता कि उनके संस्थान का नाम ‘बैंक’ कैसे पड़ा. वैसे बैंकिंग प्रणाली का जिक्र प्राचीन भारत, चीन, बेबीलोन एवं असीरियन सभ्यता के इतिहास में देखने को तो मिलता है लेकन बैंकों का जो वर्तमान स्वरूप है इससे वह पूर्णतया भिन्न था.

किस तरह अस्तित्व में आये बैंक और क्या है उनका यहूदी कनेक्शन
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‘बैंक’ शब्द का नामकरण कैसे हुआ ? बैंकों व उनकी कार्य प्रणाली पर शोध करने व किताबें लिखने वाले दुनिया के प्रसिद्ध लेखकों में से एक ‘थॉमस हर्बर्ट रसेल’ द्वारा लिखित ‘बैंकिंग, क्रेडिट्स एंड फाइनेंस’ नामक पुस्तक के अनुसार इस ‘बैंक’ शब्द की खोज इटली में पुनर्जागरण काल (Renaissance) के समय लगभग 12वीं-13वीं शताब्दी में हुयी थी.

बैंक (Bank) शब्द इटैलियन के Banco शब्द से लिया गया है, Banco शब्द का अंग्रेजी में अर्थ है Bench (मतलब एक बड़ा मेज). पर सवाल उठता है ये शब्द आया कैसे अस्तित्व में ? आखिर Bank शब्द का किसी बड़ी मेज से क्या सम्बन्ध ?

जब इटली के फ्लोरेंस शहर से यूरोप में पुनर्जागरण काल की शुरुआत हुयी तो पूरे यूरोप में तेजी से विकास कार्य की शुरुआत हुयी. बाजार तेजी से बढने लगे और बाजार के साथ-साथ उपभोक्ता, उत्पादन व लेन-देन का भी प्रचलन बढ़ने लगा. पुनर्जागरणकाल में शुरू हुए नए खरीदारी प्रचलन व बढ़ती जरूरतों के साथ ही बढ़ते उपभोक्तावाद, यही सब देखकर ‘फ्लोरेंस’ व ‘लोम्बार्डी’ जैसे इटैलियन शहर के ‘यहूदियों’ ने लोगों की जरूरतें पूरी करवाने के लिए एक ‘युक्ति’ खोज निकाली ‘लोगों को कर्ज देकर उनकी जरूरतें पूरी करवाने की.’

इसके लिए वो यहूदी सेठ एक बड़ी बेंच (Banco या Bench) लेते और उसे बाजार में लगाकर बैठ जाते. जिन्हें अपनी जरूरतें पूरी करनी होती थीं और जिनके पास धन होता था वो तो अपनी जरूरतें पूरी लेते लेकिन जिनके पास धन नही होता था उन लोगों को बाजार में ‘बेंच लगाकर बैठे’ ये यहूदी सेठ कुछ शर्तों के आधार पर (जैसे उनकी कोई सम्पत्ति गहन रख लेते या कर्ज ना अदा कर पाने की स्थिति में ग्राहकों की किसी सम्पत्ति पर कब्जा कर लेने की शर्त रखते) उनकी जरूरतों का सामान ‘उधारी में’ उपलब्ध करा दिया करते थे.

इसी तरह उधारी खिला-खिलाकर व कर्ज चढ़ाकर ये यहूदी सेठ जब एक दिन वो ग्राहक कर्ज ना चुका पाता तो उसकी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया करते. कुल मिलाकर यहूदियों की ये ‘बेंच’ पर चलने वाली व्यवस्था एक चलते फिरते बैंक की तरह थी. जैसे आजकल के बैंक ‘कई शर्तें रखने के बाद’ पहले लोन के रूप में कर्ज उपलब्ध कराते है और लोन न चूका पाने की स्थिति में आपकी सम्पत्ति पर कब्जा कर लेते हैं. इस तरह बाजार में लगे इस ‘बेंच’ (इटैलियन में बैंको) से खोज हुयी ‘बैंक’ शब्द की. ज्ञात हो कि, ब्याज लेना यहूदियों के धार्मिक ग्रंथ ‘तोराह’ में भी शामिल है. यही कारण है कि बैंक और फाइनेंस यहूदियों के खून में शुरू से ही रहा है.

एक तरह से यूरोप का पुनर्जागरण काल एक नये उत्पादन युग व उपभोक्तावाद की शुरुआत थी. उस समय चलने वाली मुद्राओं (उदाहरण स्वरूप इटली की ‘फ़्लोरिन’ मुद्रा) व उपलब्ध धातुओं तथा अन्य साधनों द्वारा खरीदारी की जाती थी. मतलब जिसके पास जितना धन रहता था वो उतनी ही खरीदारी किया करता था और दुकानदार भी किसी को उतना ही सामान बेचा करते थे जो जितना पेमेंट करता था.

किस तरह अस्तित्व में आये बैंक और क्या है उनका यहूदी कनेक्शन
दुनिया का सबसे पुराना बैंक इटली का Monte dei Paschi Source

उस समय उधारी का प्रचलन बेहद सीमित व नियंत्रित हुआ करता था क्योंकि उस काल में मनुष्य की जरूरतें भी बेहद कम हुआ करती थी, जो आसानी से पूरा हो जाया करती थीं. जिस कारण ‘नगद’ व हाथोहाथ पेमेंट का प्रचलन ज्यादा था उस काल में, लेकिन पुनर्जागरण काल ने ना ही मात्र उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया बल्कि लोगों की जरूरतें भी दिन पे दिन बढ़ाता गया जिसे पूरा करने के लिए बैंक जैसे नए नये निरंकुश माध्यमो का जन्म हुआ. आज भी धरती का सबसे पुराना बैंक इटली का Banca Monte dei Paschi di Siena है.

पुनर्जागरण काल के उपरान्त यूरोप में तेजी से फैल रहे उत्पादन व उपभोक्तावाद के समय लगभग पूरे यूरोप में दुनिया के सबसे प्रबुद्ध माने जाने वाले ‘यहूदी’ भी जगह जगह फैले हुए थे जिनका धर्म व कर्म ही ‘किसी भी तरीके से’ ‘ताकत’ (Power) व ताकत की सबसे जरूरी ईकाई ‘धन’ (Money) एकत्रित करना था, उन्होंने बाजार का अध्यन किया और उस बाजार से ही थोड़े इन्वेस्टमेंट से ही ज्यादा लाभ कैसे लिया जाय इसका तरीका भी ढूंढ निकाला ‘बैंक’ के रूप में.

उस समय ‘वस्तु विनिमय प्रणाली’ का अस्तित्व हुआ करता था. जिसमे वस्तु के बदले वस्तु प्रणाली चलती थी. कोई मुद्रा या अनाज के बदले में कुछ सामान खरीदा करता था तो कोई घर में मौजूद अन्य साधनों से जैसे सोने चांदी हीरे जवाहरातों व धातुओं के बदले में जो सामान्य धन की तरह ही आता-जाता रहता था. जरूरतें सीमित व नियंत्रित होने की वजह से लोग कहीं ना कहीं से अपने जरूरत के मुताबिक धन का जुगाड़ कर ही किया करते थे.

पर अब मुद्रा का केंद्रीयकरण हो गया है. ऐसी व्यवस्था बनाई गयी है कि, इंसानी जीवन जीने के लिए बैंक एक महत्त्वपूर्ण साधन बन गया है. एक बैंक कागज के टुकड़ों पर अपना ठप्पा लगाकर व अपने हस्ताक्षर करके दे देता है वही मुद्रा है. उसके द्वारा हस्ताक्षर किये गए कागज के टुकड़े को लोग मुद्रा के रूप में स्वीकार करने को बाध्य होते हैं.