इस्लामिक राष्ट्र ईरान में पिछले कई दिनों से सरकार विरोधी प्रदर्शन चल रहे हैं जो कि कई मौकों पर काफी हिंसक भी हो गए थे और कई लोगों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन प्रदर्शनों में सरकार के समर्थक और सरकार के विरोधी दोनों ही गुट हिस्सा ले रहे हैं. ट्विटर पर प्रदर्शनकारियों द्वारा जारी किये गये कुछ वीडियोज में प्रदर्शनकारियों और ईरानी पुलिस बलों के बीच हिंसक टकराव भी दिखा.

इस्लामिक शासन से अब मुक्ति चाहता है 'आर्यों का ईरान'
तेहरान में युवाओं का प्रदर्शन Source

ईरान की सत्ता इन प्रदर्शनों से अंदर तक हिल गयी है. सर्वोच्च ईरानी नेता अली खामनेई और राष्ट्रपति हसन रूहानी ने सुरक्षा बलों से किसी भी प्रकार प्रदर्शन को दबाने की अपील की है. ईरान में अचानक से प्रदर्शनकारियों के सक्रिय होने से पूरी दुनिया के विश्लेषक हैरान से हैं क्योंकि ईरान मिडल ईस्ट के ऐसे देशों में से आता है जहाँ की अंदरूनी राजनीति पिछले कुछ दशकों से स्थिर रही है जिसे ईरान की जनता का भी समर्थन रहा है.

हाल ही में हुए प्रदर्शन में ईरान में कुछ ऐसी नयी घटनाएँ घटी जिसने पूरी दुनिया को आश्चर्य में डाल दिया है. वह यह कि, ईरानी अब खुद को अरब और अरबी सभ्यता से अलग करना चाहते हैं. उनका सीधा सा मतलब इस्लाम से है जो उनपर थोपा गया है. ईरान में हुए प्रदर्शनों में इसकी खुलकर घोषणा की गयी कि, ईरानी अब इस्लाम एवं मुल्लाओं का शासन और नहीं झेल सकते.

ईरान में प्रदर्शनकारियों ने, खुद को आर्य बताते हुए अरबी सभ्यता के साए से ईरान को बाहर निकालने की अपील की है. ज्ञात हो कि, ईरान किसी समय आर्यों का देश हुआ करता था, इस राष्ट्र का नाम ‘ईरान’ भी आर्यन शब्द का ही अपभ्रंश है. ईरान में इस्लाम से पहले पारसी धर्म हुआ करता था जो कि आर्यन सभ्यता का ही एक अंग था. यजीदी पारसी जैसी मिडल ईस्ट की कई सभ्यताएं वास्तव में आर्य सभ्यताएं हैं जिन्होंने समय के साथ अपना मजहब बदल लिया लेकिन अपनी पहचान वो आज भी नहीं मिटा पाए. इनपर किसी समय इस्लाम थोप दिया गया था लेकिन वे अब इस्लाम के दमनकारी शिकंजे से बाहर निकलना चाहते हैं.

क्या कारण हैं इन प्रदर्शनों के

मेन स्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया में प्रदर्शकारियों के पोस्टों से जो बातें निकलकर सामने आयी हैं उसके अनुसार, ईरानी लोग अब इस्लामिक शासन से तंग आ चुके हैं और अब वो आर्यमेहर राजा पहलावी के शासन को याद कर रहे हैं. जिनके शासन में ईरानी खुली हवा में सांस लेते थे और उनपर किसी प्रकार की कोई बंदिश नहीं थी. पहलावी के शासन के दौरान ईरान एशिया के सबसे तेजी से उभरते देशों में से एक था. ना ही मात्र तेहरान जैसे शहर शिक्षा का केंद्र थे बल्कि शिराज, यज्द और इसफाहन जैसे ईरानी शहर पर्यटन का अच्छा केंद्र थे. लेकिन कट्टरपंथी अयातुल्लाह रूहुल्लाह खामनेई के नेर्तित्व में हुयी इस्लामिक क्रांति ने 1979 में ईरान को एक कट्टर इस्लामिक शिया देश में परिवर्तित कर दिया.

रूहुल्लाह खामनेई के इस्लामी सपनों में खोये ईरानियों को उस समय आशा की किरण दिखी थी जिन्हें ईरानियों ने अपनी सभ्यता का संरक्षण करने वाला समझ लिया था लेकिन आज सब बदल चुका है. आखिर ईरानियों को भी समझ आ गया है कि, ”मजहबी राष्ट्र किस प्रकार घातक होते हैं और किसी ख़ास मजहब पर आधारित देश की ज्यादा उम्र नहीं होती.”

ऐसे राष्ट्र के पतन में वही लोग सबसे ज्यादा योगदान देते हैं जिनके बाप दादाओं ने कभी ऐसा मजहबी राष्ट्र बनाया था, जहाँ मानवीय स्वभाव के विपरीत अपने व्यक्तिगत स्वभाव के अनुसार नियम-कायदे गिनती के दो चार लोगों ने पूरे देश पर जबरदस्ती थोप दिए थे. आवश्यक नहीं है जो कल सही था वो आज भी सही ही हो.

प्रदर्शनों में विदेशों ताकतों का हाथ

इस्लामिक शासन से अब मुक्ति चाहता है 'आर्यों का ईरान'
पेरिस में ईरानी शासन विरोधी प्रदर्शनों के समर्थन में सडकों पर उतरे लोग Source

जबसे ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हुए हैं तभी से लोगों ने यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि, हो ना हो इन प्रदर्शनों के पीछे अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी CIA का हाथ है. सीआईए पर लोगों के शक करने की भी अपनी एक वजह है क्योंकि आकड़ो के अनुसार सीआईए अपने बजट का सबसे बड़ा हिस्सा सिर्फ ईरान में अपने ऑपरेशन में खर्च करती है. ईरान के विरुद्ध अमेरिका और सीआईए की मानसिकता जगजाहिर है. जिसके चलते लोगों ने इन प्रदर्शनों के लिए सीआईए को जिम्मेदार ठहराया है.

ईरान के कई नेताओं ने खुलकर इन प्रदर्शनों के लिए सीआईए को जिम्मेदार ठहराया है. ईरानी नेताओं के अनुसार, सीआईए के इस मिशन में उसे इजराइल और सऊदी अरब ने भी सहयोग दिया है जिसकी बदौलत ही यह प्रदर्शन चल रहा है.

आंतरिक समस्याएं भी हैं कारण

ईरान में हुआ हालिया प्रदर्शन काफी संगठित रूप से हुआ. ईरान के प्रमुख शहर जैसे मशहद, क्यूम, इस्फहान और ज़हादान में लोगों ने एक साथ इकट्ठे होकर सरकार के खिलाफ रैलियां निकालीं. विरोध के लिए पहली बार प्रदर्शनकारी मशहद शहर में राष्ट्रपति हसन रूहानी के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए जमा हुए. विरोध इतना तेज़ हो गया कि वहां रूहानी और सुप्रीम नेता खामनेई की मौत जैसे नारे लगे. खबर फैलते ही विरोध प्रदर्शन एक शहर से दूसरे शहर और बाद में पूरे देश में फैल गया.

تعدادی از اعضای جامعه ایرانی ساکن آمریکا امروز، شنبه با هدف همراهی با اعتراضات مردمی در ایران در برابر کاخ سفید تجمع کردند. این تجمع با دعوت سازمان جوامع ایرانیان آمریکایی صورت پذیرفت. در فراخوان سازمان جوامع ایرانیان آمریکایی آمده، ایرانیان مقیم آمریکا همگام معترضین در ایران خواستار سرنگونی دیکتاتوری مذهبی در ایران هستند و از دولت آمریکا و جامعه جهانی می خواهند که اقدامات سریع و مشخصی برای مقابله با اقدامات سرکوبگرانه و همراهی با مردم آزادیخواه ایران بردارند.

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निरंकुश इस्लामिक शासन और विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियों की गतिविधियों के अलावा ईरान में विरोध प्रदर्शन के पीछे कई आंतरिक कारण भी हैं जिनमें भ्रष्टाचार, असमानता और बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है. अन्य देशों की तरह ईरान में भी अमीर लगातार और अमीर हुए हैं जबकि गरीबों की हालत बेहद दयनीय है. ईरान में बेरोजगारी दर 12% है. इसलिए प्रदर्शन करने वालों में बड़ी तादाद युवाओं की है. इसके अलावा ईरान की आर्थिक नीतियों पर भी जनता को खासी नाराज़गी है.

ईरान पर से हटे आर्थिक प्रतिबंधों से जनता को खासी उम्मीद थी. उन्होंने इसका खुले दिल से स्वागत भी किया था. उन्हें उम्मीद थी कि सरकार सीरिया और लेबनान में दखल देने की बजाए, आम जनता पर ज़्यादा खर्च करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जनता की नज़र में भ्रष्टाचार भी आंदोलन की बड़ी वज़ह है. उनका मानना है कि जनता पर खर्च न करने के पीछे भ्रष्ट सरकार का हाथ है, जो अपनी जिम्मेदारियां नहीं निभा रहीं.

युवाओँ में बढ़ती बेरोज़गारी

इस्लामिक शासन से अब मुक्ति चाहता है 'आर्यों का ईरान'
जर्मनी में ब्रेंडनबर्ग गेट के सामने ईरानी शासन विरोधी प्रदर्शनों के समर्थन में सडकों पर उतरे लोग Source

आधिकारिक रूप से ईरान में 12% बेरोजगारी है, लेकिन देश के कई हिस्सों में बेरोजगारी 60% तक है. ईरान की 8 करोड़ की आबादी में से आधे से ज्यादा आबादी 30 वर्ष से नीचे की आयु की है. 15-24 वर्षो के युवाओं के बीच बेरोजगारी करीब 27% है.

बढ़ती हुई महँगाई (मुद्रास्फीति)

ईरान के परमाणु कार्यक्रम के कारण आंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उस पर कई प्रकार के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए है. इन आर्थिक प्रतिबंधो के कारण ईरान का राजस्व कम हुआ है और उसकी मुद्रा ईरानी रियाल का भी 450% तक अवमूल्यन यानी Devaluation हुआ है. पिछले वर्ष एक डॉलर 36,000 ईरानी रियाल के रेट पर था जो इस साल 1 अमेरिकी डॉलर 42,000 ईरानी रियाल हो चुका है. मुद्रा के अवमूल्यन के कारण जीवनावश्यक चीज वस्तुए काफी महंगी हो गई है.

ईरान का संभावित भविष्य

ईरान हमेशा से Rothschild Banking System से दूर रहा है इसलिए बैंकिंग माफिया हमेशा ईरान की सरकार को लीबिया, ईराक की तरह हटाकर वहां अपनी कठपुतली सरकार स्थापित करना चाहते हैं. Reuters की एक रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान में करीब 10,000 सुन्नी ISIS लड़ाके दाखिल हो चुके है. जो कि शिया ईरान में घुसपैठ करके ईरान में अस्थिरता फैलाने के लिए तैयार बैठे है. उधर पश्चिमी ईरान में अमेरिका समर्थित कूर्द लोग एक अलग कुर्दिस्तान की मांग कर रहे है. ज्ञात रहे है कुर्दिस्तान देश सीरिया, ईराक़, तुर्की, ईरान के हिस्सों से मिलकर बनता है. अतः पड़ोसी इराकी कुर्दो से प्रेरित होकर भविष्य में ईरानी कूर्द भी कुर्दिस्तान के लिए विद्रोह करे ऐसी पूरी सम्भावना है. पाकिस्तान के बलूचिस्तान से सटा एक ईरानी प्रांत सिस्तान-बलूचिस्तान भी बलूच स्वन्त्रता आंदोलन के कारण अस्थिर है.

ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में अपने दखल के जरिये देशों का इतिहास-भूगोल बदल देने वाले ग्लोबल माफियाओं ने New World Order की स्थापना के लिए Middle East के देशों को Ralph Peters के Blood Borders के Map के अनुसार Balkenize करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. ज्ञात हो कि, कुछ वर्ष पहले अमेरिकी रक्षा संस्थान राल्फ पीटर्स ने एक ऐसे नक्शे को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया था जिसमें कई देशों का अस्तित्व मिटा हुआ था और कई नए देशों का उदय हो चुका था.

a report by Venkatesh Bhrugu & Ravi Pratap

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