संजय गाँधी को इतिहास आमतौर पर एक ताकतवर एवं तुनकमिजाज राजनीतिज्ञ के रूप में याद करता है जो सिर्फ वही करते थे जो उनकी नजर में सही होता था. बताया जाता है यही कारण था जिसके चलते कांग्रेस के ही कई नेता उन्हें नापसंद करने लगे थे.

संजय गाँधी का वो चार सूत्री प्लान जो बदल देता भारत का भविष्य
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जब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री नियुक्त हुयी थीं तब उनके मुख्य सलाहकारों में परमेश्वर नाथ हक्सर जैसे मंझे हुए अधिकारियों का मुख्यतौर पर नाम लिया जाता था लेकिन एक ऐसा समय भी आया जब सत्ता में संजय गाँधी की हनक चलने लगी थी.

खासकर आपातकाल के समय संजय गांधी की चौतरफा तूती बोलती थी. संजय गाँधी हमेशा के लिए इंदिरा गाँधी को देश की सत्ता में बिठा देना चाहते थे जिसके लिए वे चुनाव प्रणाली को भंग कर देना चाहते थे. ना ही मात्र संजय बल्कि बंसीलाल (पूर्व कांग्रेस नेता) जैसे संजय के कई करीबियों का भी यही मत था कि, चुनाव वगैरह का झंझट खत्म कर इंदिरा गाँधी को राष्ट्रपति बना दिया जाय.

संजय गाँधी ने आपातकाल के आसपास लगभग मई-जून 1975 में अपनी मां इंदिरा गांधी के समक्ष अपना चार सूत्री नियम पेश किया था जिसके अनुसार :

1. प्रधानमन्त्री राष्ट्रपति का पद हथिया लें, 

2. तीनों सशस्त्र सेनाओ के सुप्रीम कमांडर की हैसियत होने के कारण सत्ता पर एकाधिकार जमायें,

3. संविधान को रद्द कर दिया जाय और मूलभूत अधिकारों को निलम्बित कर दिया जाय,

4. सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट समाप्त कर दिए जायँ और कुछ अग्रणी कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया जाय.

बताया जाता है संजय गांधी का ये चार सूत्री प्लान इंदिरा गाँधी को रास तो नहीं आया था पर संजय के इस प्लान ने इंदिरा को एक राह जरूर दिखा दी थी जो आपातकाल के रूप में निष्पादित हुयी थी.

आपातकाल के लिए उस समय के पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे सिद्धार्थ शंकर रे का भी नाम लिया जाता है जिन्होंने इंदिरा गाँधी को यह फार्मूला सुझाया था.