भारत के पूर्व राष्ट्रपति रहे महान शिक्षाविद सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तिरुट्टनी तमिलनाडु में हुआ था. उन्होंने भारत के लिए काफी महान कार्य किये थे, वो भी ऐसे-ऐसे जो कि हर किसी के बस का नहीं था. वैश्विक राजनीति में अगर भारत का कोई मित्र दिखता है तो वह है रूस जो अगर भारत का करीबी मित्र बना था तो उसमें जिस व्यक्ति को उसका सबसे ज्यादा श्री जाता है वह थे रूस में भारत के तत्कालीन राजदूत सर्वपल्ली राधाकृष्णन जिन्होंने रूस का भारत के प्रति सोचने का नजरिया ही बदल दिया था फलस्वरूप रूस भारत के करीब आता गया.

वो राजदूत जिन्होंने रूस को ला दिया था भारत के करीब
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‘एशियाई देशों के राजनयिक विचार और व्यवहार’ नामक पुस्तक में अशोक कपूर ने लिखा है कि रूस के तत्कालीन प्रीमियर स्टालिन ने सोवियत संघ में भारत की पहली राजदूत और जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पण्डित से मिलने तक से इनकार कर दिया था. 1949 में जवाहरलाल नेहरू ने प्रख्यात दार्शनिक डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भारतीय राजदूत के रूप में मास्को भेजने का निर्णय किया.

तीन साल के भीतर ही राधाकृष्णन ने सोवियत संघ के साथ भारत के रिश्तों को पूरी तरह से बदल डाला. कपूर ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि सोवियत सरकार को इस बात का विश्वास दिलाया गया कि राधाकृष्णन स्टालिन जैसे “महान दूरदर्शी नेता” का बहुत आदर करते हैं. आख़िरकार जनवरी 1950 में स्टालिन भविष्य में राष्ट्रपति बनने वाले इस भारतीय राजदूत से मिलने के लिए तैयार हो गए.

इस भेंट के बाद राधाकृष्णन ने भारतीय दूतावास से के०पी०एस० मेनन को जो टेलीग्राम भेजा था, वह अब आम जनता के देखने के लिए उपलब्ध है. टेलीग्राम में लिखा है कि द्विपक्षीय रिश्तों में जमी बर्फ़ पिघलने के संकेत मिलने लगे हैं. राधाकृष्णन ने स्टालिन को बताया कि, भारत की तटस्थ रहने की नीति वास्तविक तथा सकारात्मक है. आज की ही तरह पिछली सदी के पाँचवे और छठे दशकों में भी रूस के लोग दार्शनिकों के प्रति बहुत आदर का भाव रखते थे.

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वास्तव में रूस स्थित भारत के राजदूत से स्टालिन की यह मुलाक़ात रूसियों के लिए भारत से जुड़ी अपनी आशंकाओं को दूर करने का पहला अवसर बनी. टेलीग्राम में लिखा है कि स्टालिन ‘यह जानने के लिए उत्सुक लगे कि भारत कनाडा जैसे देशों की तुलना में अधिक स्वाधीन है या कम.’ राजदूत राधाकृष्णन ने स्टालिन को भारत की स्थिति के बारे में समझाया.

उन्होंने इस बात की खास तौर पर चर्चा की कि भारत शीघ्र ही गणतन्त्र घोषित होने वाला है. स्टालिन भारतीय भाषाओं के बारे में भी जानने को उत्सुक थे. उन्होंने पूछा कि भारत की सबसे प्रमुख भाषा कौन-सी है. राधाकृष्णन ने लिखा है स्टालिन ने इस बात पर संतोष जाहिर किया कि हिन्दी भाषा चीनी की तरह चित्रात्मक नहीं है, बल्कि वह ध्वन्यात्मक है. इस वजह से भारत में फैली निरक्षरता को मिटाना अधिक आसान होगा, जबकि चीन में चित्रात्मक भाषा के कारण सिर्फ़ अखबार पढ़ना सीखने में ही लोगों को पाँच साल तक लग जाते हैं.

इवान ग्रिको नामक एक लेखक ने अपनी पुस्तक में लिखा है, राधाकृष्णन के ढाई साल के कार्यकाल में दोनों देशों के आपसी रिश्तों में काफ़ी सुधार हुआ, जिसकी वजह से ही सोवियत संघ ने भारत को सहायता के तौर पर गेहूँ तथा अन्य रसद सामग्री भेजीं. अप्रैल 1952 में भारत लौटने से तीन दिन पहले राधाकृष्णन ने स्टालिन से फिर मुलाकात की.

इस मुलाक़ात में भारत को लेकर सोवियत संघ की सोच में साफ बदलाव दिखाई पड़ा. जब राधाकृष्णन ने सोवियत संघ से भारत को मिली सहायता के लिए आभार प्रकट किया, तो स्टालिन ने कहा, इसमें आभार मानने जैसी क्या बात है. हमने तो सिर्फ अपना कर्तव्य पूरा किया है. राधाकृष्णन ने उत्तर में कहा कि अनेक देशों को अपने कर्तव्य की उचित समझ नहीं है और यदि है भी, तो वे उसका निर्वाह नहीं करते.

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स्टालिन के साथ इस मुलाक़ात के दौरान राधाकृष्णन ने भारतीय विदेश नीति को दिशा देने वाले सिद्धान्तों की व्याख्या की. राधाकृष्णन ने स्टालिन से कहा, हम न तो अमरीका के साथ हैं और न ही किसी दूसरी ताक़त के साथ. हम अपने विवेक के अनुसार काम करते हैं और किसी भी तरह के राजनीतिक या आर्थिक दबाव के सामने सर नहीं झुकाते. तब तक नेहरू को लेकर स्टालिन का नज़रिया बदल चुका था.

स्टालिन ने राधाकृष्णन से कहा था आप और जवाहरलाल नेहरू ऐसे आदमी हैं, जिन्हें हम अपना दुश्मन नहीं समझते. स्टालिन ने उन्हें यह भी बताया था कि, अमरीका और ब्रिटेन एशियाई देशों को पिछड़ा हुआ देश मानते हैं और उन्हें नीची निगाह से देखते हैं. जबकि रुसी लोग सभी एशियावासियों के साथ बराबरी का बर्ताव करते हैं. अपनी इसी भावना की वजह से हम सही नीति का पालन कर पाते हैं. अमरीका और ब्रिटेन के लोग उनके साथ तिरस्कार भरा बर्ताव करते हैं. हमारी इस नीति के कारण ही एशियाई देशों के साथ हमारे रिश्ते बहुत अलग तरह के हैं.

रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने के बाद 1955 में रूसी नेता निकिता ख्रुश्चेव और निकलाय बुल्गानिन भारत की यात्रा पर आए. उसके बाद भारत और रूस के आपसी रिश्ते बड़ी तेज़ी से आगे बढ़े. तब तक डॉ. राधाकृष्णन भारत के उपराष्ट्रपति बन चुके थे और भविष्य में राष्ट्रपति बनने की ओर अग्रसर थे.

भारत-रूस रिश्तों की इमारत आज जिस नींव पर खड़ी है, उसे राधाकृष्णन ने मास्को में रहते हुए भारत के राजदूत के तौर पर बड़ी मेहनत और सावधानी से धीरे-धीरे बनाया था. ऐसा भी दिन आया जब सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने और अपने पद पर रहते हुए अपनी महान छमता से देश को परिचित करवाया.

(Info Source : RBTH)