आज के समय में सोशल मीडिया सूचनाओं के प्रसार का सबसे तेज और बेहतर विकल्प बनकर उभरा है. जिसके जरिये संगठित रूप से कोई भी मिशन सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा सकता है. चाहे वह किसी व्यक्तित्त्व को बदनाम करना हो या फिर किसी का प्रमोशन करना हो. सोशल मीडिया पर पिछले कुछ वर्षो में राष्ट्र ने दुनिया के कई महान नेताओं को बदनाम होते और कई ऐसे लोगों को हीरो बनते देखा है जिनका नाम तक लेना लोग पसंद नहीं करते थे.

इस पंक्ति में पहला नाम आता है अपने समय के दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और करिश्माई नेता रहे पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरु का जिनके विरुद्ध सोशल मीडिया पर संगठित रूप से ऐसा दुष्प्रचार किया गया जिसने उनकी छवि को गहरा आघात पहुंचाया.

एक समय था जब भारतीय और दुनियाभर के लोग नेहरु को एक ऐसे नेता के तौर पर देखते थे जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा दुर्गति किये गये देश को स्थिरता प्रदान कर उसे विकास के पथ पर अग्रसर किया था वहीं अब एक ऐसे तबके का उदय हुआ है जिसकी नेहरु और उनके कार्यों के बारे में जानकारी बिलकुल शून्य है. अगर उन्हें कुछ जानकारी है तो सिर्फ उतने की ही जितना उन्होंने सोशल मीडिया पर पढ़ा है.

पिछले कई वर्षों किये जा रहे संगठित दुष्प्रचार का ही असर है कि देश के युवाओं का एक बड़ा तबका पं. नेहरु को एक अय्याश और असफल नेता के तौर पर देखता है. नेहरु के आलोचक उनके समय में भी थे और उनकी जमकर आलोचना भी करते थे लेकिन फिर भी नेहरु अपने आलोचकों का सम्मान करते थे. यह उनकी दरियादिली ही थी कि उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में अपने आलोचकों को भी जगह दी थी. वर्तमान की भारतीय राजनीति में इसकी कल्पना भी असंभव है.

सोशल मीडिया पर पं नेहरु की छवि पर बुरी तरह से की जा रही छींटाकशी वास्तव में उनके उन ऐतिहासिक कार्यों के लिए की जाती है जो उन्होंने राष्ट्र के लिए किये थे. अपने समय में नेहरु एशिया के मुख्य नेता तो थे ही साथ ही उन शीर्ष वैश्विक नेताओं में आते थे, दुनियाभर में जिनकी लोकप्रियता सबसे ज्यादा हुआ करती थी.

नेहरु को बदनाम क्यों किया गया
पंडित नेहरु की छवि एक वर्ल्ड लीडर की तरह थी जिन्हें वैश्विक शांतिदूत माना जाता था क्योंकि उन्होंने सोवियत रूस और अमेरिका के शीतयुद्ध से दूरी बनाते हुए एक ऐसे तीसरे संघ की स्थापना की थी जो दुनिया में शांति की वकालत करता था Source

नेहरु के दृष्टिकोण और उनकी दूरदृष्टि से अगर आज के नेताओं की तुलना की जाय तो ये दूर-दूर तक उनके सामने कहीं नहीं टिकते. चाहे वह भारत को एक अन्तर्राष्ट्रीय नेता के तौर पर विश्व में स्थापित करने की रही हो या फिर शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका-रूस के जाल से बचकर भारत को एक निरपेक्ष शक्ति के तौर पर प्रस्तुत करने की.

निचले स्तर की राजनीति करने वाले नेताओं की एक पुरानी रणनीति रही है अगर खुद को ऊँचा उठाना है तो खुद को अपने महान कार्यों से ऊँचा उठाने के बजाय ऐसे लोगों को दुष्प्रचार के जरिये नीचे गिरा दो जिनसे तुम खुद ऊपर जाना चाहते हो. 

ठीक यही नेहरु के साथ हुआ था जिन्होंने ब्रिटिशों से विरासत में मिले उजड़े हुए भारत को ना ही मात्र समेटा बल्कि उसके पुनर्निर्माण के लिए भी भरपूर प्रयास किये थे. जिस तरह से आजकल देश के नेता कुछ जमीनी कार्य करने के बजाय देश के विकास को लेकर ये बहाना बनाते हैं कि, पिछली सरकारों की वजह से देश का विकास नहीं हो पाया अगर उसी तरह नेहरु ने भी किया होता तो आज शायद भारत की रुपरेखा ही अलग होती.

नेहरु के पास तो बहाने बनाने के भी बहुत सारे कारण थे क्योंकि उन्हें एक ऐसे देश की सत्ता मिली थी जिसे ब्रिटिशों ने ना ही मात्र बुरी तरह लूटा था बल्कि वो देश आंतरिक रूप से भी अशांत रहे इसका भी प्रबंध कर गये थे. लेकिन नेहरु ने बहाना बनाने के बजाय अपनी सूझबूझ और दूरदर्शिता से ना ही मात्र देश को मुश्किल समय से उबारा बल्कि देश को उंचाई पर ले जाने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कार्य किये.

वर्तमान का हम जो भारत देखते हैं जब 1947 में ये नेहरु को मिला था तो ऐसा बिलकुल भी नहीं था जैसा आज है. राष्ट्र में अनेकों समस्याएं थीं. ना ही मात्र विकास और सुधार कार्यक्रमों को लेकर बल्कि देश के बिगड़े ढांचे को नया रूप देने को लेकर भी. ऐसे में नेहरु ने एक-एक ढांचे को सुसंगठित रूप से विकसित करने के साथ ही उन्हें ऐसा बनाया जो आज भी प्रासंगिक हैं.

दरअसल नेहरु को नीचा दिखाने की कोशिश करने वाले उन नेताओं और उनके समर्थकों के पास ना ही ऐसा कोई एजेंडा है ना ही ऐसा कोई दृष्टिकोण जिससे वो नेहरु के बराबर पहुंच सकें इसलिए एक ही उपाय बचता है कि, ऐसा कुछ किया जाय जिससे नेहरु का कद छोटा किया जा सके. हालाँकि ऐसा सिर्फ सोशल मीडिया पर ही संभव हो सकता है. अगर जमीन पर कार्यों की कभी भी समीक्षा होगी तो निश्चित ही नेहरु भारत के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्रियों में से एक होंगे.

भारत को नेहरु से भी बेहतर नेता भविष्य में मिल सकते हैं लेकिन इस बात से कोई भी नहीं इंकार कर सकता कि, नेहरु ही आधुनिक भारत के रचयिता था जिनके दिखाए मार्ग पर आज भी राष्ट्र और उसकी व्यवस्थाएं चल रही हैं. अगर देश के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर कुछ असफलताओं की जिम्मेदारी नेहरु को दी जाती है तो देश की सफलताओं का श्रेय निश्चित ही पं. नेहरु को जाता है.

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