”जब तक हम यह नहीं समझ पायेंगे आतंकवाद से फायदा किसे हो रहा है नुकसान किसका हो रहा है तबतक हम कभी भी आतंकवाद की जड़ तक नहीं पहुँच पाएंगे ”

आतंकवाद वर्तमान जगत का सबसे चर्चित विषय है. इस समस्या से ना ही मात्र पूरी दुनिया ग्रसित है बल्कि चारों ओर डर का ऐसा माहौल है कि, दुनिया के हर देश को हमेशा यही चिंता सताती रहती हैं कहीं उसे भी इस समस्या का सामना ना करना पड़ जाय. यह एक ऐसी वैश्विक समस्या है जिसका आज तक कोई समाधान नहीं ढूंढा जा सका और जिन देशों ने कथित रूप से इसका समाधान भी निकालने की कोशिश की उन्होंने इस मामले को सुलझाने के बजाय और ज्यादा उलझा कर रख दिया.

इस्लामिक आतंकवाद की सच्चाई जो आपके होश उड़ा देगी
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आतंकवाद समस्या का आजतक कोई समाधान इसलिए भी नहीं निकाला जा सका क्योंकि आजतक कभी भी इस समस्या की स्वतंत्रता रूप से समीक्षा ही नहीं हुयी. पिछले कुछ दशकों में आतंकवाद ने कुछ ज्यादा ही तेजी से पैर पसारे हैं. पर क्या कभी आपने सोचा है आखिर आतंकवाद का जन्म कैसे हुआ या किस तरह से यह समस्या अस्तित्व में आयी.

आतंकवाद नहीं छद्म युद्ध

दुनिया में आतंकवाद की उत्पत्ति का मूल कारण था छद्म युद्ध. यह बीते जमाने की बात हो गयी जब देशों के बीच प्रत्यक्ष तौर पर युद्ध हुआ करते थे और वे लड़ाई की लिए अपनी सेनायें भेजते थे जिसमें अपार पैसा खर्च होता था और देश कई साल पीछे चले जाते थे. अब छद्म युद्ध का जमाना है जो पर्दे के पीछे से छुपकर लड़े जाते हैं. जिन्हें देशों की सेनाएं नहीं बल्कि ख़ुफ़िया एजेंसियां और उनके द्वारा खड़ी की गयी ताकतें लड़ती हैं. जिन्हें हम आतंकवाद के नाम से भी जानते हैं.

ऐसे युद्धों में ना ही अपने सैनिकों का खून बहाना पड़ता है और ना ही बेतरतीब ढंग से अपना खजाना लुटाना पड़ता है. काफी कम खर्चों में ही आतंकवादियों के जरिये किसी भी देश के खिलाफ युद्ध छेड़ा जा सकता है. अमेरिका ने अफगानिस्तान एवं लीबिया-ईराक में ऐसे ही आतंकियों (जिन्हें विद्रोही का नाम दिया गया) के चलते वहां का तख्तापलट कर दिया और अब वही सीरिया में किया जा रहा है.

वियतनाम युद्ध के बाद बदली नीति

अगर 60-70 के दशक में जायेंगे तो पाएंगे कि अमेरिका ने जिन देशों पर आक्रमण किया था वहाँ उसने अपने सैनिकों को उतारा था लेकिन अब ऐसा नहीं होता. दरअसल अमेरिका को वियतनाम और शीतयुद्ध के दौर में हुए खाड़ी युद्धों से यह सबक मिला था कि उसकी ये नीति उसी के हाथ जला रही है जहाँ उसने ना ही मात्र जमकर पैसा बहाया बल्कि हजारों सैनिकों का बलिदान भी दिया लेकिन उसे बदले में कुछ नहीं मिला और जो खोया वो अलग से. यहीं से अमेरिकी नीतिकारों (CFR Council) ने एक नयी नीति को जन्म दिया जिसे आज हम आतंकवाद के नाम से जानते हैं.

यह कहना गलत नहीं होगा कि, आतंकवाद नामक समस्या को जन्म देने में अमेरिका का ही हाथ था जिसने अपने विरोधियों को ध्वस्त करने के लिए आतंकवाद को विदेश नीति का एक प्रमुख अंग बना दिया. आजकल छद्म युद्ध में आतंकवाद का प्रयोग अपने विरोधी देशों को अंदरूनी तौर पर खोखला एवं अशांत करने के लिए भी किया जाता है. इसमें कोई हैरानी नहीं कि आतंकवाद के जन्म और उसके पोषण में अमेरिका और उसके सऊदी और पाकिस्तान जैसे इस्लामिक सहयोगी पूर्णतया भागीदार हैं.

जब अमेरिका ने खुले तौर पर बोई आतंकवाद की फसल

80 के दशक में आतंकवाद का छद्म युद्ध के तौर पर अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे देशों ने बखूबी उपयोग किया जब अफगानिस्तान की रूस समर्थक सरकार को उखाड़ने के लिए इन तीन देशों एवं कुछ पश्चिमी ताकतों ने स्थानीय लोगों को भड़काकर उन्हें आतंकवाद के लिए तैयार किया था. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के इस प्रोजेक्ट को नाम दिया गया था ‘ऑपरेशन साइक्लोन’ जबकि इन आतंकवादियों को मुजाहिदीन नाम दिया गया. इन जिहादियों को पाकिस्तान एवं चीन में ट्रेनिंग दी गयी. यह अमेरिका का खुले तौर पर आतंकवाद के प्रयोग की नीति थी जिसकी वजह से दुनिया में बड़ा बदलाव आया.

अमेरिका का दिमाग+सऊदी का पैसा+इस्लाम का शारीरिक श्रम = आतंकवाद
Zbgniew Brzezinski with Osama Bin Laden (Claimed Pic) Source

इससे साबित होता है कि, आतंकवादियों के जन्म के लिए सीधे-सीधे अमेरिका, सऊदी अरब एवं पश्चिमी शक्तियां जिम्मेदार थीं. अमेरिका द्वारा ट्रेंड किये गये इन्हीं मुजाहिदीनों से निकले आतंकवादियों ने आगे चलकर बड़े-बड़े खूंखार आतंकी संगठनों की स्थापना की. अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन अमेरिका द्वारा रूस के खिलाफ तैयार किए गये इन्हीं मुजहिदीनों में से एक था जिसे पूरी दुनिया में आतंकवाद के चेहरे के रूप में देखा जाता है.

अमेरिका, सऊदी और इस्लामिक देश

अफगानिस्तान में रूस के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहिदीन हों या फिर दुनिया भर में आतंकवाद फ़ैलाने वाले अलकायदा जैसे आतंकी संगठन इन सबको खड़ा करने में अमेरिका का बड़ा योगदान था. इसका जिम्मेदार सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि उसके सहयोगी देश भी हैं जो अमरीकी थिंक टैंकों से निकले विचारों को पूरा करना अपना कर्तव्य समझते हैं जिसके बदले में उन्हें अमेरिकी हथियार उसका सहयोग एवं वरदहस्त प्राप्त होता है. सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे देश ऐसे ही देशों के अंतर्गत आते हैं जो अमेरिका की मंशाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं.

आतंकवाद के जन्म में अगर अमेरिकियों का दिमाग और हथियार थे तो सऊदी का पैसा और अरब-पाकिस्तान के लोगों का शारीरिक श्रम. इन्हीं तीनों के कॉकटेल से दुनिया में आतंकवाद का परिचय हुआ और यह एक गंभीर अंतर्राष्ट्रीय समस्या के रूप में उभरा.

अमेरिका की CFR काउंसिल और आतंकवाद

अमेरिकी की विदेश नीति तय करने जाने वाले संगठन CFR (Council On Foreign Relationss) को आतंकवाद का थिंक टैंक कहें तो गलत नहीं होगा. CFR के एक प्रमुख सदस्य जिब्ग्निव ब्रेजिंस्की (Zbgniew Brzezinski) जो कि अमेरिकी राष्ट्रपतियों अमेरिकन विदेश नीति के लंबे समय से सलाहकार भी हैं उनकी ओसामा बिन लादेन के साथ आयी तस्वीरें भी इसी का एक उदाहरण हैं.

यही नहीं बल्कि अफगानिस्तान से रुसी सेनाओं के जाने के बाद ब्रेजिंस्की ने खुद की पीठ भी थपथपाई थी और अपने ‘मिशन आतंकवाद’ को उस समय की आवश्यकता बताया था. विशेषज्ञों की माने तो आतंकवाद अमेरिकी विदेश नीति का एक प्रमुख अंग भी है जिसका उसने अनेक मौकों पर प्रयोग किया. ब्रेजिंस्की को कई विशेषज्ञ अलकायदा और तालिबान का गॉडफादर मानते हैं.