” युद्ध नहीं होगा तो हथियार नहीं होंगे, हथियार नहीं होंगे तो हथियार कंपनियां नहीं होंगी “

आतंकवाद का अर्थ से गहरा संबंध रहा है. बिना आर्थिक कारणों के इसका विकास नामुमकिन था. ऐसे कई देश हैं जिनके आतंकवाद से गहरे आर्थिक ताल्लुकात हैं. आतंकवाद इन देशों के लिए बहार लेकर आता है. दुनिया के कई देशों में फैला आतंकवाद सिर्फ छद्म युद्ध का अंग ही नहीं बल्कि इन युद्धप्रिय देशों के लिए शुद्ध व्यापार है जो अपने फायदे के लिए आतंकवाद फैलाते हैं. खून बहना जहाँ कुछ देशों के लिए डर और तबाही लेकर आता है वहीं हथियारों के इन व्यापारियों के लिए ये मुनाफे का सौदा होता है. कई देश ऐसे भी हैं जिनकी ख़ुफ़िया एजेंसियां इन हथियार व्यापारियों के लिए काम करती हैं और उनके मुनाफे के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं.

बड़े फायदे का सौदा है ये 'आतंकवाद'
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अमेरिका ने आतंकवाद नीति को यूँ ही जन्म नहीं दिया बल्कि यह उसके दिमाग में वियतनाम और ईराक-अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान मिली असफलता से उपजा विचार था. इन देशों में अमेरिका ने जमकर पैसा बहाया और काफी सैनिकों का बलिदान भी दिया लेकिन अमेरिका के लिए परिणाम आत्मघाती रहे. ना ही मात्र अमेरिका को बड़े आर्थिक नुक्सान उठाने पड़े बल्कि हजारों सैनिकों के बलिदान के चलते अपने ही देश में विरोध झेलना पड़ा. यह देखते हुए हुई अमेरिका और उसके नीतिकारों ने ऐसी नीति अपनाई जिसमें ना ही अमेरिकी सैनिकों को अपना खून बहाना पड़े और ना ही अमेरिका को अपना खजाना लुटाना पड़े. जो काम पहले अमेरिकी सैनिक करते थे अब वही काम ये आतंकी करते हैं जिनका खर्च अमेरिका को नहीं उठाना पड़ता (अगर उठाना भी पड़ता है तो मामूली) बल्कि बदले में ये आतंकी अमेरिका को लाभ कमाने के कई मौके उपलब्ध कराते हैं. हथियार सप्लायर अमेरिका जैसे देश एवं हथियारों के अन्य व्यापारी आतंकवाद को बेहद चरणबद्ध रुप से मुनाफे के सौदे में बदलते हैं. जो कुछ इस तरह से होता है :

ऐसे स्थानों या कह सकते हैं कि, देशों का चयन किया जाता है जिनमें अमेरिका या उसके द्वारा थोपी जाने वाली व्यवस्था के प्रति विरोध की भावना हो. इसके साथ ही ऐसे देशों में उन लोगों को तलाशा जाता है जिनमें असंतुष्टता या विद्रोह की भावना होती है. ये स्थान ऐसे भी हो सकते हैं जहाँ बड़े पैमाने पर बेरोजगारी हो और लोग तबाह हो रहे हों जिन्हें जीवन यापन के लिए किसी ना किसी मौके की जरूरत रहती है या फिर ऐसे हों जो संपन्न होते हुए भी सरकार की नीतियों से नाखुश हों. ऐसे लोगों से विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियां संपर्क साधती हैं और उन्हें संबंधित देश की सरकारों के खिलाफ भड़काना शुरू करती हैं. इसके साथ ही उन्हें जरूरी आर्थिक सहायता एवं हथियार उपलब्ध करवाती हैं. ऐसे में कोई देश युद्ध की कगार पर आ जाता है और उसे बड़े पैमाने पर अपने देश की सुरक्षा के लिए हथियारों की जरूरत पड़ती है.

इन हथियारों में एके-47 और तोपें ही नही बल्कि ताकतवर वाहन, लड़ाकू विमान और युद्धक हेलीकॉप्टर तक शामिल होते हैं जिनका सौदा खरबों रुपयों में जाता है. पहले इस नीति का प्रयोग हथियार कंपनियां देशों के मध्य युद्ध भड़काकर करती थीं ताकि वे देश अपनी सुरक्षा के लिए हथियार सप्लायर देशों से महंगे हथियार खरीदने के लिए मजबूर हो जायं और वे मालामाल बनें. लेकिन इन हथियार सप्लायरों की पैसे की हवस इतने पर ही कहाँ थमने वाली थी. उन्हें और मुनाफा चाहिए था जिसके चलते उनका एक और बड़ा ग्राहक आतंकवाद बनकर उभरा. आतंकवाद से लड़ने के नाम पर दुनिया के कई देश हथियारों से अपना खजाना भर रहे हैं.

ये हथियार अमेरिका-ब्रिटेन, इजराइल और यूरोपीय देशों से खरीदे जाते हैं. आजकल इस्लामिक स्टेट (ISIS) नामक खूंखार आतंकी संगठन काफी चर्चा में रहता है लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि, इस आतंकी संगठन को भी हथियार, गाड़ियाँ-ट्रक और जरुरी सामाग्रियां अमेरिकी कंपनियां ही उपलब्ध कराती हैं. जिस तरह एके-47 के बिना आतंकवादी अधूरे होते हैं उसी तरह आतंकियों के बीच एक मिनी ट्रक काफी लोकप्रिय है जो कि आतंक का प्रतीक भी बन चुका है. यह है जापानी कंपनी टोयोटा का ताकतवर हायलेक्स ट्रक जो कि दुनिया के हर आतंकी संगठन के पास मिलेगा. टोयोटा की गाड़ियाँ आतंकवादियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं, ओसामा बिन लादेन और ज्यादातर अलकायदा कमांडर भी टोयोटा लैंड क्रूजर पर ही बैठना पसंद करते थे. हालांकि टोयोटा जापानी कंपनी है लेकिन फिर भी जापान ने आतंकियों को कभी भी टोयोटा के ये वाहन नहीं सप्लाई किये बल्कि ये उन्हें आतंकियों के उन आकाओं द्वारा सप्लाई किये गये जो कि उन्हें पालते-पोसते हैं.

बड़े फायदे का सौदा है ये 'आतंकवाद'
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दुनियाभर में फैले आतंकवाद पर अध्ययन करने वाले विश्लेषक डेविड किलक्यलैन के अनुसार, अफगानिस्तान में आतंकवादियों के लिए खासतौर पर टोयोटा के ये हायलेक्स ट्रकों के बेड़े भेजे जाते थे लेकिन ये कनाडा से अफगानिस्तान कैसे पहुँचते थे और किसके द्वारा पहुंचाए जाते थे ये डेविड ने कभी नहीं बताया. 2014 में आई खबरों की माने तो अमेरिका ने सीरिया की विद्रोही फौज की मदद के लिए हथियारों का जखीरा भेजा था जिसमें 43 हायलेक्स ट्रक भी शामिल थे. बताया जाता है सीरिया के विद्रोही नेताओं ने जंग में शानदार प्रदर्शन के चलते अमेरिका से खासतौर पर हायलेक्स ट्रकों की मांग की थी. खबरों माने तो सीरिया की विद्रोहियों को ब्रिटेन की तरफ से आने वाली मदद में भी ये ट्रक शामिल थे. यहाँ पर सवाल उठना स्वाभाविक है कि, आतंकवादियों को ये सुविधाएँ कौन उपलब्ध करवाता है और उनका लक्ष्य क्या होता है.

रिपोर्ट्स की माने तो इस्लामिक स्टेट के आतंक ने कई अमेरिकी कंपनियों को मालामाल बना दिया. इस तरह के आतकवाद में एक अघोषित नीति इस्तेमाल की जाती है कि, यह ऐसी जगह ही फैलाया जाता है जहाँ लंबे समय तक के फायदे के लिए खनिज संपदा, नशीले पदार्थों की खेती या फिर पेट्रोलियम पदार्थ हों. तेल का भंडार माने जाने वाले अरब देशों एवं अकूत की अफीम पैदा करने वाले अफगनिस्तान में आतंकवाद को यूँ ही नहीं बढ़ावा दिया गया. बल्कि इसमें अमेरिका के अपने निजी स्वार्थ निहित थे. अफगानिस्तान में आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अमेरिकी सैनिक कुछ और नहीं बल्कि अफीम की इसी खेती की रक्षा करते हैं. अफीम जैसे पदार्थ की कीमत करोड़ों में होती है. दुनिया के कई बड़े बिजनेस घरानों की संपन्नता के पीछे भी अफीम और नशीले पदार्थों का व्यापार ही था जिसने उन्हें अरबों-खरबों का फायदा पहुँचाया.

जो अमेरिका शांति एवं निःशस्त्रीकरण को बढ़ावा देने की बातें करता है और उत्तर कोरिया जैसे देशों द्वारा अपनी सुरक्षा के लिए हथियार विकसित करने पर उन्हें आँखें दिखाता है वही अमेरिका वर्तमान में हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर है. दुनिया भर के देशों से रक्षा सौदे करने के लिए अमेरिकी कंपनियां बेताब रहती हैं. इसके लिए उन्हें ज्यादा प्रयास भी नहीं करना पड़ता क्योंकि अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियां और उनकी मीडिया जो कि दुनिया भर की मीडिया को नियंत्रित करती है ऐसा माहौल बनाते हैं कि उससे डरकर कई देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हथियार खरीदने को मजबूर हो जाते हैं. कई देशों में तो आतंकी हमले भी इसीलिये करवाए जाते हैं कि, वो अपनी सुरक्षा के लिए हथियार खरीदें.

अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब सऊदी अरब के खिलाफ किसी समय आग उगलने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सऊदी अरब आये एवं आतंकवाद को पोषित करने के लिए बदनाम सऊदी को खरबों डॉलर के हथियार सप्लाई करने का सौदा करके गये. ये वही डोनाल्ड ट्रंप हैं जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से कुछ दिन पहले ही सऊदी अरब को आतंकवाद पैदा करने वाला देश बताने के साथ ही 9/11 हमले के लिए भी सऊदी को ही जिम्मेदार बताया था. ट्विटर पर सऊदी प्रिंस अलवलीद बिन तलाल से हुयी एक बहस में भी ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद सऊदी पर लगाम कसने को भी कहा था लेकिन चुनाव जीतने के बाद जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति एक शुद्ध व्यापारी की तरह सऊदी आये और खरबों डॉलर के हथियारों का सौदा करके गए वह वाकई चौंकाने वाला था.

ट्रंप ना ही मात्र सऊदी अरब आये बल्कि सऊदी राजघराने के सदस्यों के साथ ऐसे थिरके जिसे देखकर हर कोई दंग रह गया. इसी से समझा जा सकता है कि, अमेरिका में सत्ता किसी की भी हो हथियार व्यापारियों के फायदे के लिए वहां के राष्ट्रपति सिर्फ उनके प्रतिनिधि हैं जिन्हें उनके लिए ग्राहक तैयार करने ही होते हैं चाहे उसके लिए बेशर्मी की किसी भी हद से गुजरना पड़े. कई रक्षा विशेषज्ञ पेट्रोलियम पदार्थों से मालामाल सऊदी को अमेरिका की दूध देने वाली गाय भी कहते हैं क्योंकि सऊदी प्रत्यक्ष तौर पर अमेरिकी मिशनों के लिए जमकर पैसे बहाता है. चाहे वह अफगानिस्तान में रूस के खिलाफ युद्ध रहा हो या फिर सीरिया में चल रहा वहां की राष्ट्रभक्त जनता के खिलाफ अमेरिका का छद्म युद्ध. अमेरिका सऊदी और अरबी एवं पश्चिमी देश ना ही मात्र सीरिया में आतंकवादियों को हथियार उपलब्ध करवा रहे हैं बल्कि अमेरिकी कंपनियां इस खून-खराबे में जमकर मालामाल हो रही हैं.

आतंकवाद सिर्फ किसी धर्म या समुदाय का विषय नहीं बल्कि यह सिर्फ और सिर्फ युद्ध और व्यापारिक फायदे का एक नया रूप है जिसका प्रयोग लोगों को मारने के लिए नहीं बल्कि हथियार व्यापारी देशों द्वारा अपने फायदे के लिए किया जाता है. वह बात और है यह फायदा बिना खून बहाए संभव नहीं है. जिस तरह हर दवा कंपनियां चाहती हैं कि, बीमारियाँ बढ़ती रहें ताकि उनकी दवा बिकती रहे, उनका व्यापार चलता रहे इसी तरह हथियार कंपनियां और हथियार सप्लायर देश भी चाहते हैं कि, लड़ाइयाँ होती रहें, आतंकवाद का डर बना रहे ताकि उनके हथियार बिकते रहें.