आतंकवाद को लेकर लोगों की हमेशा यही सोच रही है कि यह लोगों को डराने का और उनका कत्लेआम करने का मात्र एक साधन भर है लेकिन असल में इसके पीछे की कहानी कुछ और ही है. आतंकवाद ना ही मात्र किसी देश को भयाक्रांत करने का साधन है बल्कि यह अपने प्रतिद्विंदी देशों को काबू में रखने और उसका आर्थिक विकास रोकने के लिए एक महत्त्वपूर्ण हथियार भी है. भारत जैसे देशों में फैला आतंकवाद महज आतंकवाद ही नहीं है बल्कि छद्म युद्ध का एक उदाहरण है.

भारत के खिलाफ शुरू किया गया आतंकवाद कुछ विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियों का संयुक्त प्रोजेक्ट था जिसका मकसद भारत को अस्थिर करना और एक गंभीर समस्या में उलझाए रखना था. इसी तरह भारत में सक्रिय अनेकों आतंकी संगठन विदेशी ख़ुफ़िया एजेंसियों द्वारा ही पाले गये भाड़े की सैनिक हैं जो समय-समय पर अपनी उपयोगिता सिद्ध करते रहते हैं.

अगर आप भारत में हुए आतंकी हमलों का अध्ययन करेंगे तो आप पायेंगे कि, वे सभी ऐसे स्थानों में किये गये जो कि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. चाहे वो राजधानी दिल्ली एवं अन्य मेट्रो शहरों की सुपरमार्केट्स में किये गये हमले हों या आर्थिक राजधानी मुंबई पर हुए हमले, ये सभी इस बात के सबूत हैं कि, भारत ऐसे आतंकवाद की चपेट में है जिसे छद्म युद्ध कहा जाता है. पठानकोट जैसे रक्षा प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों से भी ये साफ़ जाहिर है कि आतंकवाद का मकसद भारत में मात्र भय फैलाना भर नहीं है.

आतंकवाद या भारत के खिलाफ छद्म युद्ध ?
Mid-Day

अर्थव्यवस्था किसी भी देश की रीढ़ होती ही और ये हमले साफ़ बताते हैं कि, भारत में आतंकवादियों का लक्ष्य लोगों को मारना या भयभीत करना नहीं बल्कि भारत की आर्थिक रूप से कमर तोड़ना है. वरना अगर उनका लक्ष्य लोगों को मारना होता तो भारत जैसे देश में ऐसे स्थानों की कोई कमी नहीं जहाँ वो आसानी से एक साथ हजारों लोगों का कत्लेआम कर सकते हैं.

यह कहना गलत नहीं होगा कि, आतंकवाद के जन्म के पीछे चाहे वह छद्म युद्ध के रूप में प्रयोग हो या व्यापार के रूप में दोनों में ही अमेरिका और सऊदी अरब जैसे देशों की भूमिका संदिग्ध रही है. ज्यादातर आतंकियों के पास मिलने वाले हथियार और साजो सामान उन्हें अमेरिकी कंपनियां ही उपलब्ध कराती हैं जबकि इसमें कोई शक नहीं कि आतंकी जिस विचारधारा का अनुसरण करते हैं उसका सबसे बड़ा पोषक सऊदी अरब है.

वर्तमान में आतंकवाद अमेरिकी विदेश नीति का एक प्रमुख अंग बन चुका है जिसमें सऊदी जैसे देश अमेरिका का साथ दिया करते हैं. यह देखना बेहद हास्यास्पद होता है कि, आये दिन भारत जैसे देश अमेरिका के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बातें करते हैं और उससे पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करने के लिए कहते हैं. यह ठीक उसी तरह है जैसे बिल्ली से दूध की रखवाली करने के लिए विनती की जाय.

असलियत यह है कि आतंकवाद जैसी समस्या का जन्म अमेरिका के द्वारा ही हुआ था. जिब्ग्निव ब्रेजिंसकी जैसे  कई अमेरिकी अधिकारी यह बात खुलेआम स्वीकारते हैं कि, उनकी तात्कालिक विदेश नीति के लिए आतंकवाद का जन्म अति आवश्यक था. अगर बात हो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की तो सीरिया-ईराक और अफगानिस्तान का उदाहरण हमारे सामने है जहाँ अमेरिका ने ही इन देशों की स्थित बद से बदतर बना दी है.