भारत के बंटवारे के बारे में आप कितना जानते हैं ?

शायद एक आम भारतीय पाकिस्तानी की तरह यही कि, मुस्लिमों को अपने लिए एक अलग देश चाहिए था और वे भारत में हिन्दुओं के साथ नहीं रहना चाहते थे इसलिए उन्होंने जिन्ना के नेर्तित्व में एक मुस्लिम देश पाकिस्तान का निर्माण किया. दुनियाभर के ज्यादातर विद्वान बंटवारे के लिए भारत की तरफ से नेहरु और पाकिस्तान की तरफ से जिन्ना को मुख्य कारण बताते हैं क्योंकि इन नेताओं ने ही बंटवारा स्वीकार किया था और बंटवारे के पश्चात् दोनों को ही बदले में ब्रिटिशों ने सत्ता सौंपी थी. गाँधी से नफरत करने वाले कुछ धड़े बंटवारे के लिए गाँधी को भी लपेटते हैं जबकि वास्तविकता में गाँधी किसी भी सूरत में भारत का बंटवारा नहीं चाहते थे और ना ही उन्होंने भारत के बंटवारे को कभी स्वीकार किया था.

सोवियत रूस के डर से ब्रिटिशों ने बांटा था भारत
बंटवारे के पश्चात् भारत | Wikimedia Commons

हिन्दुओं-मुस्लिमों की वजह से हुए बंटवारे का जो कारण दुनिया को बताया जाता है वह हमेशा से संदिग्ध रहा है. यह प्रश्न आज भी बना हुआ है कि, ब्रिटिशों का आखिर वह कौन सा हित था जिसने उन्हें भारत के नेताओं को बंटवारे के लिए उकसाया क्योंकि दरिंदे ब्रिटिश भारत या हिन्दुओं-मुस्लिमों के हितैषी नहीं थे जो उनके बीच कोई समाधान निकालने के लिए भारत के टुकड़े करते और एक-एक समुदाय को एक-एक टुकड़ा पकड़ा देते. इसलिए इतना तो निश्चित था कि, बंटवारा ब्रिटिशों ने अपने हित के लिए ही किया था लेकिन वह हित कौन सा था आजतक उसपर कभी चर्चा नही हुयी. लगभग सभी इतिहासकारों ने भारत के बंटवारे को हिन्दू-मुस्लिमों की लड़ाई में लाकर समेट दिया है.

ब्रिटिशों का वह कौन सा हित था जिसके लिए उन्होंने भारत के टुकड़े किये ?

भारत के बंटवारे के लिए हिन्दू-मुस्लिम एंगल से बाहर निकलकर उस समय की वैश्विक परिस्थितियों के बारे में जानने की जरूरत है जो ब्रिटिशों के भारत में आने एवं द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में बनी थीं. हमें ब्रिटेन रूस के बीच कई वर्षों तक चले ‘द ग्रेट गेम’ को समझना होगा. ये बात कम ही लोगों को पता होगी रुसी इस दुनिया में सबसे ज्यादा नफरत ब्रिटिशों से करते थे और उन्हें चोर-लुटेरा कहकर ही संबोधित करते थे. यहाँ तक कि, रुसी अंग्रेजी भाषा को भी हेय दृष्टि से देखते थे और इसे चोर-लुटेरों की भाषा बताते थे. उसका कारण था ब्रिटिशों का छल-कपट और लुटेरों जैसा व्यवहार जिसे रुसी बहुत पहले से ही समझते थे. हालाँकि द्वितीय विश्युद्ध में हिटलर के चलते ब्रिटिशों और रूसियों को एक साथ भी आना पड़ा था.

नेपोलियन (फ़्रांस) और जार पॉल प्रथम (रूस)

ब्रिटिशों ने जब भारत में अपना शासन स्थापित किया था तब 1801 के आसपास भी रूस के जार पॉल ने फ्रांस के तत्कालीन सम्राट नेपोलियन के साथ मिलकर अफगानिस्तान और भारत पर आक्रमण कर भारत से ब्रिटिश प्रभाव खत्म करने की योजना बनाई थी क्योंकि इसका प्रभाव बाद में रुस के हितों पर भी पड़ना था और अंततः भविष्य में ऐसा ही हुआ भी जब ब्रिटिशों ने भारत सहित पेट्रोलियम पदार्थों से लबरेज अरब देशों पर अपना आधिपत्य कर लिया. भारत में ब्रिटिशों कब्जा होने के बाद से ही रूस मध्य एशिया और भारत से ब्रिटेन का सफाया करके एशिया पर अपना प्रभाव स्थपित करना चाहता था जिसके लिए उसने ईरान के शाह से संधि भी की थी और अफगानिस्तान के अमीर के पास भी अपने दूत भेजे थे.

सोवियत रूस के डर से ब्रिटिशों ने बांटा था भारत
विंस्टन चर्चिल और उसकी War Cabinet, साथ में क्लीमेंट एटली और अर्नेस्ट बेवन | Sky News

अर्नेस्ट बेवन 1947

3 जून, 1947 को, ब्रिटिश विदेश मंत्री अर्नेस्ट बेवन ने मार्गेट में ब्रिटिश लेबर पार्टी की वार्षिक बैठक को बताया कि भारत का विभाजन मध्य पूर्व में ब्रिटेन को मजबूत करने में मदद करेगा.

क्लीमेंट एटली 1946

चर्चिल की War Cabinet के मुख्य सदस्यों में से एक एवं तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने ब्रिटिश भारत साम्राज्य को लेकर एक कैबिनेट मिशन नियुक्त किया था जिसने भारतीय नेताओं को ब्रिटेन के साथ मिलकर 10 वर्ष तक एक संघ सरकार चलाने का प्रस्ताव दिया था. एटली के कैबिनेट मिशन द्वारा दिए गये प्रस्ताव पर जिन्ना ने अपनी सहमति दे दी थी लेकिन गाँधी जी ने इसे मानने से इंकार कर दिया था

विंस्टन चर्चिल 1945

द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी के आत्मसमर्पण करने के बाद 3 मई 1945 को ब्रिटिश विदेशमंत्री विंस्टन चर्चिल ने अपनी War Cabinet को आदेश दिया कि, वह भारत और हिंद महासागर में ब्रिटिश साम्राज्य के हितों की रक्षा के लिए ऐसी रणनीति तैयार करे जो लंबे समय तक के लिए प्रभावशाली रहे.

स्टालिन 1941-1946

सोवियत रूस के डर से ब्रिटिशों ने बांटा था भारत
स्टालिन, चर्चिल और अमेरिकन राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन | Politico

सौ से अधिक वर्षों से चली आ रही रूस की मध्य पूर्व सहित अफगानिस्तान और सिंध जीतने की ये इच्छा 1945 में समाप्त हुए द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मन साम्राज्य को पराजित करने के बाद और भी बलवती हो चली थी. उस समय रूस में समाजवादी शासक स्टालिन का शासन हुआ करता था जो अपने इरादों के बेहद पक्के थे.

20वीं सदी में अमेरिका यूरोप के साथ ही रूस भी अच्छी औद्दोगिक प्रगति कर रहा था जिसके कारण रूस को एक ऐसा गर्म जल वाला बन्दरगाह चाहिए था जहाँ पर वर्ष के 365 दिन आवागमन होता रहे. जिसके लिये भारत का कराची बन्दरगाह रूस के लिए सबसे उपयुक्त और करीब पड़ता था. स्टालिन की नजर कराची बंदरगाह पर थी. 

रूसी शासक स्टालिन की इस मंशा की भनक ब्रिटिशों को पहले ही लग गयी थी जिसके लिए उन्होंने दूसरी चाल चली भारत को बांटने की. चूँकि अगर स्टालिन अपने लक्ष्य में सफल हो जाते तो ना ही मात्र भारतीय उपमहाद्वीप से ब्रिटेन का सफाया हो जाता बल्कि मध्य पूर्व के पेट्रोलियम संसाधनों तक भी रूस अपनी पहुंच बना लेता.

सोवियत रूस के डर से ब्रिटिशों ने बांटा था भारत
AH-7 Highway जो रूस के Yekaterinburg से कराची तक आता है, संभवतः स्टालिन ने इसी रास्ते से कराची बंदरगाह तक पहुंचने का सपना देखा था | Wikimedia Commons

20वीं सदी की शुरुआत में मिडल ईस्ट में हुयी पेट्रोलियम की खोज ने दुनियाभर की ताकतों की इस क्षेत्र में रूचि बढ़ा दी  थी. ईरान और अरब में हुयी तेल की खोजों में मुख्यतौर पर ब्रिटेन और अमेरिका शामिल थे लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध में 1941 में रूस और ब्रिटेन ने ईरान पर कब्जा कर लिया था जिसे Anglo-Soviet Invasion of Iran भी कहा जाता है. ब्रिटेन-रूस का ईरान पर यह हमला द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तेल की सप्लाई बनाये रखना था. लेकिन जब द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो Allied Powers (ब्रिटेन-अमेरिका-रूस) ने फैसला किया कि, 6 महीने के अंदर वह ईरान छोड़ देंगे लेकिन ब्रिटेन-अमेरिका की मध्य-पूर्व का पेट्रोल कब्जाने की मंशा को भांपते हुए रूस ने यह अवधि खत्म होने के बाद ईरान छोड़ने से मना कर दिया.

सोवियत रूस द्वारा ईरान का बंटवारा 

सोवियत रूस के डर से ब्रिटिशों ने बांटा था भारत
रूस द्वारा ईरान को काटकर बनाये गये देश 1945-1946 | Wikimedia Commons

इस दौरान रूस ने मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए ईरान में ही अपने समर्थक गुटों के साथ मिलकर दो देशों की स्थापना की जिनमें से एक प्रो-सोवियत ईरानी अजरबैजानियों का ‘पीपल रिपब्लिक ऑफ़ अजरबैजान’ जबकि दूसरा देश कुर्दों का ‘रिपब्लिक ऑफ़ माहाबाद’ था.

रूस का यह कदम कोल्ड वॉर की शुरुआत भी माना जाता है. नए-नए बने इन दोनों देशों को अमेरिका-ब्रिटेन समर्थित ईरान ने दो साल के अंदर ही फिर से जीतकर उनके पुराने स्वरूप में ला दिया. ईरान घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सत्ताधीशों को इसका भय था कि. अगर ब्रिटेन ने भारत को उसके पुराने स्वरूप में ही छोड़ दिया तो यहाँ रूस की गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं और सिंध प्रांत में स्थित कराची बदंरगाह जिसपर रूस की नजर थी वह उसे हासिल कर सकता है.

इसका सीधा सा मतलब था मध्य-पूर्व पर एक बार फिर रूस की पहुंच सुनिश्चित हो जाती. तत्कालीन रुसी शासक स्टालिन अपने इरादों के बेहद ही मजबूत थे और वह जो चाह लेते थे उसे पूरा करने के लिए पूरी ताकत से प्रयास करते थे जिसके बारे में ब्रिटेन को बखूबी पता था. अफगानिस्तान  उस समय भारत सामरिक रूप से ब्रिटेन के लिए बेहद ही महत्त्वपूर्ण था. अगर भारत/अफगानिस्तान की जमीन पर रूस ब्रिटेन की टक्कर होती तो इसमें ब्रिटेन को भारी नुकसान होता इसलिए यह आवश्यक था कि, एक बीच का रास्ता निकाला जाय जिससे रूस को भी रोका जा सके और मध्य-पूर्व पर ब्रिटिश सत्ता की हनक बरकरार रखी जा सके.

मध्य-पूर्व के पेट्रोलियम संसाधन कब्जाने और भारतीय उपमहाद्वीप एवं हिन्द महासागर के उपनिवेशों पर पकड़ बनाये रखने के लिए जरूरी था भारत का बंटवारा और एक ऐसे देश का उदय जिसकी विचारधारा भारत और रूस विरोधी हो एवं ब्रिटेन-अमेरिका समर्थक हो. 

निष्कर्ष यह था कि, ब्रिटेन को भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य पूर्व में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए एक ऐसा देश चाहिए था जो भारत विरोधी भावना से भरा हो और समाजवाद अर्थात् रूस की विचारधारा से कोसों दूर हो. जिससे मध्य पूर्व के अथाह पेट्रोलियम संसाधनों पर रूस या भारत की एंट्री रोकी जा सके. यही कारण था कि, एक ऐसे देश का निर्माण किया गया जो इस्लामिक हो.

भारत बंटवारे की जड़ें निश्चित ही द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात उपजी वैश्विक परिस्थितियों में हैं ना कि हिन्दू-मुस्लिम दंगो और लड़ाइयों में क्योंकि 1947 का दौर एक ऐसा काल था जब कट्टर इस्लाम का सफाया हो चुका था और दुनिया भर के मुस्लिम उदारवादी बनने के साथ ही एक नयी विचारधारा का अनुसरण कर रहे थे जो कि, समाजवाद और पूंजीवाद का एक मिश्रित स्वरूप था. उस समय ऑटोमन साम्राज्य का खलीफा शासन भी ढह चुका था और आज के सऊदी अरब जैसी ऐसी कोई ताकत नहीं थी जो इस्लाम का प्रचार करती या किसी इस्लामिक देश की मांग को समर्थन देती.

भारत बंटवारे के लिए जो व्यक्ति सबसे बड़ा खलनायक बनकर उभरा वह था ब्रिटेन का प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल उसकी War Cabinet जिसने माउंटबेटन और जिन्ना को भारत बंटवारे के लिए तैयार किया था. चर्चिल ने जिन्ना को एक अलग देश का प्रधानमंत्री बनाने का लालच देकर उसे उकसाया था और ब्रिटिश एजेंडे पर अड़े रहने के लिए तैयार किया था. चर्चिल ने इसके लिए छद्म नाम से जिन्ना को कई पत्र भी भेजे थे और भारत बंटवारे के लिए उसने ब्रिटिश राजपरिवार से संबंध रखने वाले माउंटबेटन की नियुक्ति भारत में गवर्नर जनरल के रूप में करवाई थी.

Sources & Facts :
Shadow of The Great Game by Maharaja Narendra Singh Sarila,
Inputs from many articles like ‘Who Is to Blame for Partition?’ by Alex Von Tunzelmann (British Historian)
Some Facts & Images from Wikipedia

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